श्रीमातङ्गीकवचम्
विनियोग 1
ध्यान 2
कवच 10
फलश्रुति 6
समापन 1
परिचय
दस महाविद्याओं में मातङ्गी (राजमातङ्गी / उच्छिष्ट-चाण्डालिनी) वाणी, संगीत, विद्या एवं वशीकरण की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह तन्त्रोक्त श्रीमातङ्गीकवचम् — महाऽऽगमरहस्य में दत्तात्रेय-वामदेव संवाद के रूप में वर्णित — साधक के शिखा से पाद तक प्रत्येक अङ्ग की रक्षा देवी के भिन्न-भिन्न रूपों से करता है, और अन्त में वाणी, ऐश्वर्य, सन्तति व मोक्ष का फल बताता है।
यहाँ संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः दिया गया है; अर्थ व्याख्यात्मक है। कुछ पाठान्तर एवं अस्पष्ट पंक्तियाँ भावानुसार समझायी गई हैं। धार्मिक-विद्वत् समीक्षा अपेक्षित।
संदर्भ 2
- Sanskrit Documents — श्रीमातङ्गीकवचम् — mAtangIkavacha, Lalitha Parameswari द्वारा संशोधित
संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः; बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं, अर्थ व्याख्यात्मक। धार्मिक समीक्षा अपेक्षित।
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- GuruKripa — श्रीमातङ्गी कवचम् (अर्थ सहित) — अंग-प्रत्यंग की रक्षा का विवरण और व्याख्यात्मक अर्थ
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।