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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

श्रीताराकवचम्

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प्रस्तावना 1

विनियोग 1

कवच 29

फलश्रुति 21

लेखन एवं धारण विधि 8

समापन 1

परिचय

दस महाविद्याओं में द्वितीया भगवती तारा — उग्रतारा, नीलसरस्वती, एकजटा — की उपासना का यह तन्त्रोक्त कवच श्रीरुद्रयामल तन्त्र में वर्णित है, जिसे शिव ने पार्वती को उपदेश किया। इसमें प्रणव, ‘ह्रीं’, ‘स्त्रीं’, ‘हूँ’, ‘फट्’ आदि बीजमन्त्रों तथा देवी के उग्र रूप के अङ्गों द्वारा शिर से चरण तक, दिशाओं में एवं युद्ध, विवाद, श्मशान, वन व जल जैसी विषम अवस्थाओं में रक्षा का आवाहन है।

यहाँ संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः दिया गया है; अर्थ व्याख्यात्मक है। बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं। धार्मिक-विद्वत् समीक्षा अपेक्षित।

संदर्भ 2

  • Sanskrit Documents — ताराकवचम् (उग्रताराकवच) — taaraakavach / UgraTaraKavacham, रुद्रयामल तंत्र, Ravin Bhalekar द्वारा एन्कोड व संशोधित

    संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः; बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं, अर्थ व्याख्यात्मक। धार्मिक समीक्षा अपेक्षित।

    लाइसेंस: Verified against sanskritdocuments.org

  • ManBlunder — Rudrayāmalokta Ugra Tārā Kavacam (verse-by-verse meaning) — अंग-रक्षा का विवरण और बीज-मंत्रों का कार्यात्मक अर्थ

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।