रहीम के दोहे
आकार
प्रदर्शन
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून॥
बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करे तलवारि॥
जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटि जाहिं।
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुख मानत नाहिं॥
रहिमन ओछे नरन सों, बैर भली न प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति विपरीत॥
वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटन वारे को लगे, ज्यों मेहंदी को रंग॥
रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय॥
खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को, चहिए यही सजाय॥
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
शब्दार्थ
धागा सूत, तागा, डोरी
चटकाय झटके से, तोड़कर
गाँठ गाँठ, गठान
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
शब्दार्थ
प्रकृति स्वभाव, प्रवृत्ति
कुसंग बुरी संगत
भुजंग साँप, सर्प
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून॥
शब्दार्थ
पानी जल; चमक (मोती की); इज्ज़त/सम्मान (मनुष्य का)
सून शून्य, सूना, व्यर्थ
चून आटा
बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
शब्दार्थ
बिगड़ी खराब हुई, बिगड़ी हुई
फाटे दूध फटा हुआ दूध
मथे मथना, मंथन करना
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करे तलवारि॥
शब्दार्थ
लघु छोटा
डारि फेंक देना, त्याग देना
सुई सिलाई की सुई
जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटि जाहिं।
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुख मानत नाहिं॥
शब्दार्थ
घटि कम होना, घटना
गिरधर गिरि (पर्वत) को धारण करने वाले — श्रीकृष्ण
मुरलीधर मुरली (बाँसुरी) धारण करने वाले — श्रीकृष्ण
रहिमन ओछे नरन सों, बैर भली न प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति विपरीत॥
शब्दार्थ
ओछे नीच, तुच्छ, छोटी सोच वाले
बैर शत्रुता, दुश्मनी
स्वान कुत्ता
वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटन वारे को लगे, ज्यों मेहंदी को रंग॥
शब्दार्थ
उपकारी परोपकार करने वाला, भलाई करने वाला
मेहंदी मेहँदी (हिना)
बाँटन बाँटने वाला, वितरण करने वाला
रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय॥
शब्दार्थ
विपदा विपत्ति, कठिन समय, संकट
हित मित्र, हितैषी, शुभचिंतक
अनहित शत्रु, अहितैषी
खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को, चहिए यही सजाय॥
शब्दार्थ
खीरा ककड़ी
लौन नमक
करुए कड़वे
सजाय सज़ा, दण्ड
परिचय
अब्दुर्रहीम खानखाना (1556-1627) मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक और हिंदी भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। वे एक योद्धा, राजनीतिज्ञ और विद्वान होने के साथ-साथ अत्यंत उदार और दानशील व्यक्ति थे। रहीम जी ने ब्रजभाषा में नीति, प्रेम, भक्ति और जीवन के व्यावहारिक ज्ञान पर अनेक दोहों की रचना की। उनके दोहे सरल भाषा में गहन अर्थ रखते हैं और आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के वे एक अनुपम उदाहरण हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।