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आसमाई व्रत कथा

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आसमाई (आशा माई) का व्रत मनोकामना-पूर्ति के लिए किया जाता है। यह उत्तर प्रदेश और बिहार का लोक-व्रत है। नीचे इस व्रत का माहात्म्य, व्रत कथा एवं व्रत विधान दिया गया है।

व्रत का दिन: वैशाख, आषाढ़ या माघ मास का कोई रविवार। कौन-सा रविवार, यह परिवार की परम्परा से तय होता है — कई घरों में वैशाख का पहला रविवार। पूर्णिमांत और अमांत पंचांग में इन मासों की सीमाएँ एक पखवाड़ा आगे-पीछे होती हैं, इसलिए अपने कुल का पंचांग मानें। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

आसमाई व्रत का माहात्म्य

आसमाई के विषय में मान्यता है कि इनकी प्रसन्नता से जीवन की हर आशा पूरी होती है। इनकी प्रसन्नता के लिए महिलाएं विशेषकर पुत्रवती महिलाएं इनका व्रत रखती हैं। वैशाख, आषाढ़ तथा माघ के महीने में किसी रविवार के दिन आसमाई की पूजा और व्रत रखा जाता है।

आसमाई व्रत कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर प्रदेश और बिहार की लोक-कथा)

एक राजकुमार था जो माता पिता के लाड़ प्यार के कारण बहुत अधिक शरारती हो गया था। वह नगर की कन्याओं की मटकी को गुलेल से फोड़ देता था। नगरवासियों की शिकायत सुनकर एक दिन राजा को बहुत क्रोध आया और उन्होंने राजकुमार को देश निकाला दे दिया।

राजकुमार अपने घोड़े पर सवार होकर चला जा रहा था। जब एक वन में पहुंचा तो उसने देखा कि तीन वृद्ध महिलाएं अपने अपने हाथों में गगरी लिये चली आ रही हैं। जब राजकुमार उन वृद्ध महिलाओं के समीप पहुंचा तब उसके हाथ से चाबुक छूट गया और नीचे गिर पड़ा। कुमार उस चाबुक को उठाने के लिए झुका तो महिलाओं को लगा कि राजकुमार उन्हें प्रणाम कर रहा है। इस पर उन्होंने पूछा कि तुम हम तीनों में किसे प्रणाम कर रहे हो। राजकुमार ने तब तीसरी महिला की ओर संकेत किया। वह महिला देवी आशा माई थी।

आशा माई राजकुमार पर प्रसन्न हुईं और बोलीं — “ये तीन अनमोल रत्न तुम सदा अपने पास रखना, जब तक ये रत्न तुम्हारे पास हैं तुम्हें कोई पराजित नहीं कर सकता।” आशा माई से विदा लेकर राजकुमार एक नगर में पहुंचा जहां का राजा चौसर खेलने में बहुत ही निपुण था। राजकुमार ने उस राजा को पराजित करके उसका सारा राजपाट जीत लिया। पराजित राजा ने राजकुमार की कुशलता को देखते हुए उससे अपनी पुत्री की शादी कर दी। कुछ दिनों के बाद राजकुमार अपनी पत्नी की इच्छा को देखते हुए अपने पिता और माता से मिलने चल दिया। वहां उसके माता पिता पुत्र के विछोह से दुःखी होकर अंधे हो गये थे। आशा माई की कृपा से वे भी भले चंगे हो गये और परिवार की खुशहाली एवं सुख शांति लौट आयी। यही है आशापूर्णी आस माई की कथा।

व्रत विधान

इस व्रत के दिन महिलाएं पान के पत्ते पर गोपी चंदन अथवा श्रीखंड चंदन से पुतली बनाती हैं। इस पर चार कौड़ियां स्थापित करती हैं। महिलाएं सुन्दर अल्पना बनाकर उस पर कलश बैठाती हैं। इस व्रत का पालन करने वाली महिलाएं गोटियों वाला मांगलिक सूत्र पहन कर आस माई को भोग लगाती हैं तथा अन्य महिलाओं को भेंट भी करती हैं। इस व्रत में नमक खाना वर्जित है, इसलिए पूजा और कथा के बाद व्रती एक समय मीठा भोजन करती है। गोटियों वाला मांगलिक सूत्र गाँठों वाला पूजित धागा है — कई घरों में बारह गाँठों का गंडा — जिसे पूजा के बाद पहना जाता है।

पूजा का क्रम सामान्यतः यह रहता है: संकल्प, पान की पुतली और कलश की स्थापना, पूजन, कथा, मांगलिक सूत्र धारण और भोग। पूजा के बाद कौड़ियां सँभालकर रख ली जाती हैं और अगले व्रत में फिर प्रयोग होती हैं।

इस व्रत में कौड़ियों की पूजा एवं मटकी स्थापित करने का विधान इसलिए है क्योंकि राजकुमार को मटकियों को फोड़ने के कारण देश निकाला मिला था और कौड़ियों से ही वह चौसर में राज्य जीत सका था।

कथा-भेद: यह लोक-कथा क्षेत्र और परिवार के अनुसार बदलती है। कई घरों में वन में चार वृद्धाएँ मिलती हैं — भूखमाई, प्यासमाई, नींदमाई और आसमाई — और आसमाई राजकुमार को तीन रत्नों के स्थान पर चार कौड़ियां देती हैं; इसी कारण पूजा में चार कौड़ियां रखी जाती हैं।

मान्यता है कि श्रद्धा से यह व्रत करने पर कष्ट दूर होते हैं और आशाएँ पूरी होती हैं।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — आसमाई व्रत कथा, पृष्ठ 309–310

    कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में छपाई की भूलें (कड़ियां → कौड़ियां, विक्षोह → विछोह) और व्याकरण सुधारे गए तथा पाठक को सम्बोधित प्रचार-पंक्ति हटाई गई; व्रत का दिन, पूजा का क्रम और कथा-भेद वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।