भैया दूज कथा
भैया दूज (यम द्वितीया) कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भाई-बहन के स्नेह का पर्व है। महाराष्ट्र-गोवा में इसे भाऊबीज, बंगाल में भाई फोंटा और नेपाल में भाई टीका कहते हैं। इसी दिन चित्रगुप्त पूजा भी होती है। होली के बाद चैत्र कृष्ण द्वितीया की “होली भाई दूज” एक अलग पर्व है। नीचे इससे जुड़ी दो पारम्परिक कथाएँ और पूजा-विधि दी गई है।
तिथि: कार्तिक शुक्ल द्वितीया (दोनों पंचांगों में समान)। यह दीपावली के बाद की द्वितीया है, जो सामान्यतः लक्ष्मी पूजन के दो दिन बाद पड़ती है, पर तिथि-क्षय या वृद्धि से कभी तीन दिन बाद भी। तिलक उस दिन के अपराह्न में होता है जब द्वितीया हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
भैया दूज कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (यम-यमुना की प्रचलित व्रत-कथा)
भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम संज्ञा था। उन्हीं की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था (सूर्य और संज्ञा की सन्तान के रूप में यम और यमी अर्थात् यमुना का वर्णन विष्णु पुराण आदि में मिलता है)। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थीं। वे उनसे बराबर निवेदन करती थीं कि इष्ट मित्रों सहित उनके घर आकर भोजन करें। लेकिन अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालते रहते थे। कार्तिक शुक्ल द्वितीया का दिन आया। यमुना ने उस दिन यमराज को भोजन का निमंत्रण देकर उन्हें अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया।
यमराज ने सोचा— मैं तो प्राणों को हरने वाला हूँ। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। यही सोचकर यमराज ने बहन के घर जाने का निर्णय कर लिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। यमुना ने उन्हें स्नान कराकर पूजा के बाद अनेक व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से प्रसन्न होकर यमराज ने बहन को वर मांगने का आदेश दिया। यमुना ने कहा— भद्र! आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करके टीका काढ़े, उसे आपका भय न रहे।
यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह ली। इसी दिन से इस पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो भाई इस दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैया दूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।
भैया दूज कथा (अन्य)
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (यम-यमुना की प्रचलित कथा का दूसरा रूप)
दीपावली के बाद आने वाली कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भाई दूज के नाम से जाना जाता है। इस दिन भाई अपनी बहन के हाथों रोली-अक्षत लगवाकर मिठाई खाता और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ द्रव्य भी देता है। इस दिन भाई के लिए बहन के घर का भोजन करने का विधान है। परन्तु कहीं-कहीं जिनके भाई बहन के घर नहीं पहुँच पाते उनकी बहनें भाई के घर पर जाकर उन्हें टीका लगाकर मिठाइयाँ खिलाती हैं।
पौराणिक कथाओं के आधार पर ऐसा कहा जाता है कि एक बार यमुना (नदी) ने अपने भाई यमराज की मांगलिक द्रव्यों से टीका लगाकर उन्हें भोजन कराया था। जिस दिन यमुना ने भाई से आग्रह कर भोजन आदि से सन्तुष्ट किया था, उस दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि थी। तभी से इस पर्व को माना जाने लगा। बहन की सेवा से सन्तुष्ट होकर यमराज ने यमुना से वरदान मांगने के लिए कहा। बहन यमुना ने उत्तर दिया— आज की पुनीत तिथि के दिन जो भाई-बहन एक साथ मेरे जल में स्नान करें, उन्हें अन्त काल में यम-यातना न भोगनी पड़े और वे जीवनकाल में सभी प्रकार से सुख-समृद्धि को प्राप्त हों। अपनी बहन को अभीष्ट वरदान देकर यमराज अपने लोक को चले गए।
यह पर्व श्रद्धापूर्वक मनाने की परम्परा है।
पूजा-विधि
द्वितीया के अपराह्न में बहन थाली में रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और नारियल (गोला) सजाती है। भाई को आसन पर बिठाकर वह उसके माथे पर रोली-अक्षत का तिलक करती है, आरती उतारती है और मिठाई खिलाती है। भाई बहन को उपहार या दक्षिणा देता है और उसके घर भोजन करता है।
अनेक परिवारों में इस दिन यमराज और यमुना का पूजन तथा यम के निमित्त दीपदान भी होता है। मथुरा के विश्राम घाट पर भाई-बहन साथ यमुना-स्नान करते हैं। यह उपवास का पर्व नहीं है; कुछ परिवारों में बहनें तिलक करने तक भोजन नहीं करतीं, जो कुल-परम्परा पर निर्भर है।
टिप्पणी
दोनों कथाओं में वरदान का रूप भिन्न है: पहली में भाई का आदर कर तिलक करने वाली बहन को यम का भय न रहने का वर है, दूसरी में साथ यमुना-स्नान करने वाले भाई-बहन को यम-यातना से मुक्ति का। पुस्तिकाओं में दोनों रूप प्रचलित हैं।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — भैया दूज कथा, पृष्ठ 282–283
दोनों कथाएँ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों (पृष्ठ 282–283) से उतारी गईं और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गईं। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में व्याकरण और छूटे शब्द सुधारे गए; तिथि-नियम, पूजा-विधि और टिप्पणी के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।