चित्रगुप्त पूजा कथा
भगवान चित्रगुप्त जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले देवता माने जाते हैं और कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन इनकी पूजा का विधान है। यह पूजा विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के कायस्थ समाज में “कलम-दवात पूजा” के रूप में होती है; तमिलनाडु में चित्रगुप्त की पूजा चैत्र पूर्णिमा (चित्रा पौर्णमी) को होती है। नीचे चित्रगुप्त पूजा का माहात्म्य, पूजा विधि और व्रत कथा पारम्परिक पाठ के अनुसार दी गई है।
तिथि: कार्तिक शुक्ल द्वितीया — यम द्वितीया, भैया दूज का दिन (दोनों पंचांगों में समान)। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
चित्रगुप्त पूजा कथा एवं माहात्म्य
कथा-स्रोत: पारम्परिक माहात्म्य (चित्रगुप्त की उत्पत्ति की प्रचलित कथा; किसी पुराण-अध्याय से सत्यापित नहीं)
जो भी प्राणी धरती पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है क्योंकि यही विधि का विधान है। भगवान राम और श्रीकृष्ण ने भी अवतार-लीला पूर्ण कर पृथ्वी लोक से प्रस्थान किया। मृत्युपरान्त क्या होता है और जीवन से पहले क्या है यह एक ऐसा रहस्य है जिसे कोई नहीं सुलझा सकता। लेकिन शास्त्रों और ऋषि-मुनियों के कथन के अनुसार इस मृत्युलोक के ऊपर एक दिव्य लोक है जहां न जीवन का हर्ष है और न मृत्यु का शोक, वह लोक जीवन मृत्यु से परे है।
इस दिव्य लोक में देवताओं का निवास है और फिर उनसे भी ऊपर विष्णु लोक, ब्रह्मलोक और शिवलोक है। जीवात्मा अपने प्राप्त शरीर के कर्मों के अनुसार विभिन्न लोकों को जाता है। जो जीवात्मा विष्णु लोक, ब्रह्मलोक और शिवलोक में स्थान पा जाते हैं उन्हें जीवन चक्र में आवागमन यानी जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है और वे परमलक्ष्य को प्राप्त होते हैं (मुक्ति का स्वरूप विभिन्न दर्शनों में भिन्न-भिन्न बताया गया है)।
जो जीवात्मा कर्म बंधन में फंसकर पाप कर्म से दूषित हो जाता है उन्हें यमलोक जाना पड़ता है। मृत्यु काल में इन्हें अपने साथ ले जाने के लिए यमलोक से यमदूत आते हैं जिन्हें देखकर ये जीवात्मा कांप उठता है, रोने लगता है परन्तु दूत बड़ी निर्ममता से उन्हें बांध कर घसीटते हुए यमलोक ले जाते हैं। इन आत्माओं को यमदूत भयंकर कष्ट देते हैं और ले जाकर यमराज के समक्ष खड़ा कर देते हैं। इसी प्रकार की बहुत सी बातें गरुड़ पुराण में वर्णित हैं।
यमराज के दरबार में उस जीवात्मा के कर्मों का लेखा जोखा होता है। कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले भगवान हैं चित्रगुप्त। यही भगवान चित्रगुप्त जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त जीवों के सभी कर्मों को अपनी पुस्तक में लिखते रहते हैं और जब जीवात्मा मृत्यु के पश्चात यमराज के समक्ष पहुँचता है तो उसके कर्मों को एक-एक कर सुनाते हैं, जिनके अनुसार यमराज उसे स्वर्ग या नरक का फल देते हैं।
भगवान चित्रगुप्त परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी हैं। इनकी कथा इस प्रकार है कि सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से जब भगवान विष्णु ने अपनी योग माया से सृष्टि की कल्पना की तो उनकी नाभि से एक कमल निकला जिस पर एक पुरुष आसीन था। चूंकि इनकी उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की रचना और सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से हुई थी अतः ये ब्रह्मा कहलाये। इन्होंने सृष्टि की रचना के क्रम में देव-असुर, गंधर्व, अप्सरा, स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी को जन्म दिया। इसी सृष्टि-क्रम में सूर्यदेव और संज्ञा के पुत्र यमराज को धर्मराज का पद प्राप्त हुआ, क्योंकि धर्मानुसार उन्हें जीवों को उनके कर्मों का दण्ड देने का कार्य मिला था। धर्मराज ने जब एक योग्य सहयोगी की मांग ब्रह्मा जी से की तो ब्रह्मा जी ध्यानलीन हो गये और कथा के अनुसार एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद एक पुरुष उत्पन्न हुआ। इस पुरुष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था अतः ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ा।
चित्रगुप्त पूजा विधि
भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में कर्म की किताब, कलम, दवात और जल है। ये कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय मिलता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की मूर्ति स्थापित करके अथवा उनकी तस्वीर रखकर श्रद्धापूर्वक सभी प्रकार से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दूर एवं भांति भांति के पकवान, मिष्ठान्न एवं नैवेद्य सहित इनकी पूजा करें। और फिर जाने अनजाने हुए अपराधों के लिए इनसे क्षमा याचना करें। मान्यता है कि यमराज और चित्रगुप्त की पूजा एवं उनसे अपने बुरे कर्मों के लिए क्षमा माँगने से नरक का फल नहीं भोगना पड़ता। इस संदर्भ में एक कथा यहां उल्लेखनीय है।
कायस्थ परिवारों में इस दिन कलम-दवात की पूजा होती है: नई कलम, दवात और बही या कागज़ चित्रगुप्त जी के सामने रखकर पूजे जाते हैं, और पूजा के बाद कागज़ पर “श्री चित्रगुप्ताय नमः”, अपना नाम-पता तथा वर्ष भर के आय-व्यय का लेखा लिखकर अर्पित किया जाता है। कई परिवारों में पूजा पूरी होने तक उस दिन कलम से लिखने का काम नहीं किया जाता। उपवास का कोई सर्वमान्य नियम नहीं है; कुछ लोग पूजा होने तक उपवास रखते हैं।
चित्रगुप्त पूजा व्रत कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (यम द्वितीया की प्रचलित कथा; किसी पुराण-अध्याय से सत्यापित नहीं)
सौराष्ट्र में एक राजा हुए जिनका नाम सौदास था। राजा अधर्मी और पाप कर्म करने वाला था। इस राजा ने कभी कोई पुण्य का काम नहीं किया था। एक बार शिकार खेलते समय जंगल में भटक गया। वहां उन्हें एक ब्राह्मण दिखे जो पूजा कर रहे थे। राजा उत्सुकतावश ब्राह्मण के समीप गया और उनसे पूछा कि यहां आप किनकी पूजा कर रहे हैं। ब्राह्मण ने कहा आज कार्तिक शुक्ल द्वितीया है, इस दिन मैं यमराज और चित्रगुप्त महाराज की पूजा कर रहा हूं। इनकी पूजा नरक से मुक्ति प्रदान करने वाली है। राजा ने तब पूजा का विधान पूछकर वहीं चित्रगुप्त और यमराज की पूजा की।
काल की गति से एक दिन यमदूत राजा के प्राण लेने आ गये। दूत राजा की आत्मा को जंजीरों में बांधकर घसीटते हुए ले गये। लहूलुहान राजा यमराज के दरबार में जब पहुंचा तब चित्रगुप्त ने राजा के कर्मों की पुस्तिका खोली और कहा कि हे यमराज यूं तो यह राजा बड़ा ही पापी है, इसने सदा पाप कर्म ही किए हैं परंतु इसने कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को हमारा और आपका व्रत पूजन किया है अतः इसके पाप कट गये हैं और अब इसे धर्मानुसार नरक नहीं भेजा जा सकता। इस प्रकार राजा को नरक से मुक्ति मिल गयी।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — चित्रगुप्त पूजा कथा, पृष्ठ 263–264
माहात्म्य, पूजा-विधि और कथा पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों (पृष्ठ 263–264) से उतारे गए और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किए गए। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में अर्थ-दोष, व्याकरण और यमराज की उत्पत्ति (भैया दूज पृष्ठ के अनुरूप सूर्य-संज्ञा के पुत्र) सुधारे गए; तिथि-नियम और कलम-दवात पूजा का अंश वेद पथ द्वारा लिखा गया है।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।