कौमारिकी व्रत कथा
कौमारिकी व्रत भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय (स्कन्द) को समर्पित है और इस परम्परा में चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को स्कन्द षष्ठी के रूप में मनाया जाता है। नीचे इसकी व्रत कथा, पूजा विधि एवं माहात्म्य दिया गया है।
तिथि: चैत्र शुक्ल षष्ठी (दोनों पंचांगों में समान); पंचमी-युक्त षष्ठी श्रेष्ठ मानी जाती है। स्कन्द षष्ठी हर मास की शुक्ल षष्ठी को भी रखी जाती है; दक्षिण भारत में कार्तिक (तमिल ऐप्पसि) शुक्ल षष्ठी तक छह दिन का कंद षष्ठी व्रत और सूरसंहार पर्व सबसे प्रमुख है, और कई स्थानों पर मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी सुब्रह्मण्य षष्ठी के रूप में मनाई जाती है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय को कुमार (स्कन्द) भी कहा जाता है; इसी से यह षष्ठी “कौमारिकी” (कुमार से सम्बन्धित) कहलाती है। कुछ परम्पराओं में इन्हीं के जन्म दिवस के रूप में चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी मनाई जाती है; वाराह पुराण में इनका जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को बताया गया है। इस व्रत में कार्तिकेय एवं उनकी माता पार्वती की पूजा की जाती है। कौमारिकी षष्ठी व्रत आमतौर पर महिलाएं रखती हैं। वाराह पुराण में षष्ठी तिथि को स्कन्द से जोड़ा गया है। कुमार कार्तिकेय का व्रत होने के कारण इसे स्कंद षष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है।
कौमारिकी षष्ठी व्रत कथा
कथा-स्रोत: पौराणिक — तारकासुर-वध और कार्तिकेय-जन्म की कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, कुमार खण्ड), स्कन्द पुराण और वाराह पुराण में भिन्न-भिन्न रूपों में मिलती है; यहाँ पुस्तिका का संक्षिप्त रूप दिया गया है।
राक्षस राज तारकासुर का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। उसने देवलोक पर आक्रमण करके देवराज इन्द्र को पराजित कर दिया। देवतागण अपनी दुर्दशा से काफी दुखी हुए और ब्रह्मा जी के पास अपनी समस्या लेकर उपस्थित हुए। ब्रह्मा जी ने देवताओं की समस्या को सुनकर काफी विचार किया और कहा कि तारकासुर का अंत केवल शिव पुत्र कर सकता है। इस उत्तर को सुनकर देवतागण चिंतित हो उठे क्योंकि शिव सती के वियोग में समाधि लगाए हुए थे। शिव को समाधि से जगाना फिर उनका विवाह कराना देवताओं को असंभव कार्य लग रहा था।
देवताओं की परेशानियों को दूर करने के लिए कामदेव ने शिव को समाधि से जगाने का आश्वासन दिया। कामदेव को अपने प्रयास में सफलता मिली और शिव की समाधि टूट गई। कामदेव को इस दुःसाहस के कारण अपना शरीर खोना पड़ा। देवताओं ने जब शिव से तारकासुर के विषय में कहा तब शिव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने देवताओं के कल्याण हेतु दूसरा विवाह करना स्वीकार किया।
दूसरी तरफ सती पार्वती रूप में पुनर्जन्म लेकर शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। शिव ने पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उनसे विवाह कर लिया। पुस्तिका की परम्परा के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन शिव और पार्वती के पुत्र के रूप में कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ। पुराणों के अनुसार शिव का तेज अग्नि और गंगा के द्वारा शरवण (सरकण्डों के वन) में पहुँचा, जहाँ बालक प्रकट हुआ। कहा जाता है कि छह कृत्तिकाओं ने कुमार कार्तिकेय का पालन-पोषण किया अतः इनका नाम कार्तिकेय पड़ा।
देवताओं ने भगवान शिव से कार्तिकेय को मांगकर उनकी पूजा की और उन्हें अपना सेनापति बनाकर तारकासुर की नगरी पर आक्रमण कर दिया। कथा-परम्परा के अनुसार तारकासुर और कुमार कार्तिकेय का युद्ध छह दिनों तक चलता रहा (दक्षिण भारतीय परम्परा में षष्ठी को सूरपद्म-वध से जोड़ा जाता है)। इस युद्ध में कार्तिकेय ने अपनी शक्ति के प्रहार से तारकासुर का वध कर दिया। देवताओं को तारकासुर द्वारा हड़प लिया गया स्वर्ग वापस मिल गया।
कौमारिकी षष्ठी व्रत विधि
कौमारिकी षष्ठी व्रत में पंचमी से युक्त षष्ठी तिथि के दिन व्रत रखना श्रेष्ठ माना जाता है। इस व्रत में पंचमी के दिन से व्रत आरम्भ किया जाता है। षष्ठी के दिन भी व्रत रखकर कुमार कार्तिकेय एवं माता पार्वती की पूजा की जाती है। लोक-परम्परा में मान्यता है कि व्रती (पूजा करने वाला) स्वयं दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके कुमार कार्तिकेय को अर्घ्य दे। स्कन्द कुमार को दही, घी, चावल, फल एवं मिष्टान्न अर्पित करने का भी विधान है। पुस्तिका के अनुसार कार्तिकेय भगवान को वस्त्र एवं तांबे का चूड़ा भी भेंट किया जाता है। पूजा के बाद श्रद्धालु भक्त स्कन्द कुमार (कार्तिकेय) की आरती भी गाते हैं। व्रती चाहें तो इस दिन फलाहार कर सकते हैं। षष्ठी की संध्या को पूजा के बाद या अगले दिन सप्तमी को प्रातः पूजा करके व्रत का पारण किया जाता है।
दक्षिण दिशा की मान्यता
लोक-परम्परा में व्रती दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके कार्तिकेय की पूजा करते हैं; इस मान्यता के पीछे एक लोक-कथा है। कथा के अनुसार एक बार शिव जी और माता पार्वती ने गणेश एवं कार्तिकेय जी से कहा कि जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करके लौट आएगा उसकी पूजा पहले होगी। (यह लोक-परम्परा का रूप है; शिव पुराण में यही प्रसंग इस बात से जुड़ा है कि पहले किसका विवाह होगा।) कार्तिकेय जी मोर पर चढ़कर पृथ्वी की परिक्रमा करने लगे।
गणेश जी का वाहन चूहा था अतः वह कार्तिकेय की भांति तेजी से पृथ्वी की परिक्रमा नहीं कर सकते थे। इस स्थिति में गणेश जी ने बुद्धि से काम लेते हुए माता-पिता की परिक्रमा पूरी कर ली। माता-पिता की परिक्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा के समान माना गया है, अतः गणेश जी को विजयी घोषित कर दिया गया।
कार्तिकेय जी इस बात से नाराज होकर दक्षिण दिशा में चले गये (शिव पुराण के अनुसार वे क्रौंच पर्वत पर जा बसे)। मान्यता है कि इसी कारण व्रती दक्षिण की ओर मुख करके कार्तिकेय की पूजा करते हैं। दक्षिण भारत में कार्तिकेय सभी देवों में प्रमुख माने जाते हैं, वहां इन्हें मुरुगन स्वामी के नाम से पूजा जाता है।
स्कन्द षष्ठी माहात्म्य
मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान सुख मिलता है, और संतान के कल्याण के लिए भी यह व्रत उत्तम माना गया है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — कौमारिकी व्रत कथा, पृष्ठ 250–251
पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों (पृष्ठ 250–251) से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया; पुस्तिका का यह अंश एक पुराने वेब-लेख से लिया हुआ प्रतीत होता है। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में पुरानी तिथि हटाई गई, नाम, तिथि-परम्पराएँ, वर्तनी और स्वास्थ्य-दावे सुधारे गए; तिथि और पारण की पंक्तियाँ वेद पथ द्वारा लिखी गई हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।