पथवारी माता कथा
पथवारी माता रास्ते (पथ) की लोक-देवी हैं, जिनका स्थान प्रायः गाँव के रास्ते पर, पीपल के पास बना छोटा चबूतरा या पत्थरों का ढेर होता है। राजस्थान, ब्रज और मालवा की लोक-परम्परा में यह लोक-कथा शीतला अष्टमी तथा कार्तिक मास में पथवारी पूजते समय कही जाती है।
तिथि: शीतला अष्टमी — चैत्र कृष्ण अष्टमी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में फाल्गुन कृष्ण अष्टमी); तथा कार्तिक मास में कार्तिक-स्नान के दिनों में, कार्तिक पूर्णिमा तक। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
पथवारी माता कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (राजस्थान व ब्रज की लोक-कथा)
लोक-कथा के अनुसार एक गूजरी माई थी। उसकी दो बहुएँ थीं। दोनों बहुओं को सास ने दूध बेचने के लिए पास के गाँव में भेजा। बड़ी बहू काफी होशियार थी और पैसों का हिसाब भी रखना जानती थी, इसलिए रोज दूध बेचकर सारे पैसे लाकर सास को दे देती थी। इसके विपरीत छोटी बहू बहुत भोली थी। उसे हिसाब लगाना नहीं आता था।
एक दिन जब वह दूध बेचने जा रही थी तब उसने देखा कुछ महिलाएं पथवारी पूजन कर रही हैं तथा पीपल के पेड़ को जल से सींच रही हैं। बहू ने उन महिलाओं से पूछा पथवारी पूजन कर सींचने से क्या फल मिलता है। इस पर उन महिलाओं ने बताया पथवारी माता सींचने से अन्न, धन तथा लक्ष्मी मिलती है। महिलाओं की बातें सुनकर छोटी बहू ने दूध वहीं बड़े पीपल पर चढ़ाकर पथवारी माता को सींच दिया। वह हर दिन इसी तरह दूध ले जाती तथा पथवारी सींच आती।
कुछ दिन बाद जब सास ने बहू से दूध के पैसे माँगे तो उसने दूसरे दिन लाने को कह दिया, लेकिन वह अगले दिन भी पैसे नहीं लाई। इस तरह पूरा एक महीना बीत गया। तब सास ने कहा आज पैसे लेकर ही आना। अगले दिन जब वह पैसे लेने के लिए घर से चली तो उदास होकर पथवारी माता के चबूतरे के समीप बैठ गई। तभी पथवारी माता बुढ़िया का रूप धारण करके आई और बोली, बेटी, तू उदास क्यों बैठी है? बहू बोली मेरी सास मुझे रोज दूध बेचने भेजती थी मगर मुझे दूध बेचना आता ही नहीं, इसलिए मैं तो पथवारी माता को दूध से सींच देती थी। आज सास ने पैसे लेकर आने को कहा है। अब आप ही बताएं मैं पैसे कहाँ से लेकर जाऊँ।
बुढ़िया माई बोली बेटी यह पत्थर पड़े हैं, इन्हें टोकरी में भरकर ले जा और इन पत्थरों को कोठे में रख देना। बहू ने बुढ़िया के कहे अनुसार पत्थर टोकरे में भर लिए और घर लौट कर कोठे में रख दिया। हमेशा की तरह जब सास ने पैसे माँगे तो बहू बोली माँजी कोठे में रखे हैं। सास ने जैसे ही कोठे का दरवाजा खोला तो देखा कि उसमें अपार हीरे-मोती और धन रखा था। सास ने छोटी बहू से पूछा इतना धन कहाँ से लाई है? इस पर बहू ने कहा मैं हर रोज पथवारी माता को सींच देती थी, उन्हीं की कृपा से ये धन मिला है।
यह सारी बात जब बड़ी बहू को पता चली तो उसने सोचा छोटी तो कच्चा दूध सींचती थी, मैं तो गरम दूध से सींचूँगी। यह सोच वह गरम-गरम दूध रोज सींचने लगी। छोटी बहू की तरह पूरा महीना बीतने पर वह पथवारी माता के पास जाकर बैठ गई। पथवारी माता बुढ़िया के रूप में आई और बोली बेटी क्या चाहिए? बड़ी बहू बोली मैं हर रोज़ पथवारी माता को गरम-गरम दूध से सींचती रही हूँ। अब सास पैसे माँग रही है, कहाँ से लाऊँ पैसे? इस पर बुढ़िया माई बोली यह पत्थर रखे हैं तू भी ले जा।
बड़ी बहू ने ढेर सारे पत्थर टोकरी में भरे और बड़ी मुश्किल से घर तक पहुँची कि ठोकर खा कर गिर पड़ी। सारे पत्थर घर के आगे गिर पड़े। आने-जाने वाले ठोकरें खाते और कोसते। वह पुनः पथवारी माता के पास जाकर बोली हे माता तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? तब पथवारी माता बोली छोटी बहू ने बड़ी लगन एवं भाव से और बिना लालच के दूध सींचा था और तूने लालच से मेरे ऊपर गरम-गरम दूध चढ़ाया, जिससे मेरे शरीर पर फफोले पड़ गए हैं। बड़ी बहू को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने माफ़ी माँगी। पथवारी माता ने उसे माफ कर दिया।
॥ बोलो पथवारी माता की जय ॥
पाठ-भेद: कुछ क्षेत्रों में यह कथा एक बहू और उसकी सास की कही जाती है, जिसमें बहू पीपल को दूध और पथवारी को दही से सींचती है और कार्तिक पूर्णिमा को उसकी भक्ति का फल मिलता है।
पूजा-विधि
- पथवारी का स्थान रास्ते पर पीपल के पास का चबूतरा या पत्थरों का छोटा ढेर होता है; जहाँ यह न हो, वहाँ स्त्रियाँ मिट्टी या पत्थर से पथवारी बनाकर पूजती हैं।
- स्नान के बाद लोटे में जल लेकर (कई घरों में कच्चा दूध या दही मिलाकर) पथवारी और पीपल को सींचा जाता है।
- रोली, अक्षत और फूल चढ़ाकर दीपक जलाया जाता है, परिक्रमा की जाती है और यह कथा कही-सुनी जाती है।
- शीतला अष्टमी पर यह पूजा उस दिन के बासी भोग के साथ होती है; कार्तिक में कार्तिक-स्नान के बाद प्रतिदिन या पूर्णिमा को।
- पथवारी पूजन के लिए अलग उपवास अनिवार्य नहीं माना जाता; जो शीतला अष्टमी या कार्तिक का व्रत रखती हैं, वे उसी व्रत के नियम मानती हैं।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — पथवारी माता कथा, पृष्ठ 295–296
कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में व्याकरण-दोष सुधारे गए और "पौराणिक" के स्थान पर "लोक-कथा" लिखा गया; तिथि, पाठ-भेद और पूजा-विधि वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।