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ऋषि पंचमी व्रत कथा

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ऋषि पंचमी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है और यह पर्व सप्तर्षियों की आराधना को समर्पित है। नीचे इस व्रत की पूजा विधि एवं कथा दी गई है।

तिथि: भाद्रपद शुक्ल पंचमी (दोनों पंचांगों में समान)। व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन मध्याह्न में पंचमी तिथि हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

मान्यता है कि ऋषि पंचमी का व्रत सभी के लिए फलदायक होता है। इस व्रत को श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन कर कथा श्रवण करने का बहुत महत्व होता है। मान्यता है कि यह व्रत पापों का नाश करने वाला व श्रेष्ठ फलदायी है। मूलतः यह सप्तर्षियों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व है। उत्तर भारत के साथ महाराष्ट्र और नेपाल में भी यह व्रत व्यापक रूप से किया जाता है; यह हरितालिका तीज के दो दिन बाद आता है।

ऋषि पंचमी पूजन

पूर्वकाल में यह व्रत समस्त वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था, किन्तु समय के साथ-साथ अब यह अधिकांशतः स्त्रियों द्वारा किया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी बहुत महत्व होता है। सप्तर्षियों — कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ — तथा अरुन्धती की प्रतिमाओं को स्थापित करके उन्हें पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। तत्पश्चात उन पर चन्दन का लेप लगाना चाहिए, फूलों एवं सुगन्धित पदार्थों, धूप, दीप, इत्यादि अर्पण करने चाहिए तथा श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मन्त्र जाप करना चाहिए।

व्रत के नियम

  • व्रतराज आदि व्रत-ग्रन्थों के अनुसार इस व्रत में हल से जोते गए खेत का अन्न नहीं लिया जाता; शाक, कंद-मूल, फल अथवा तिन्नी (नीवार) या सांवा जैसे बिना जोते उगे अन्न लिए जाते हैं। महाराष्ट्र में इस दिन ऐसी ही सब्ज़ियों से “ऋषीची भाजी” बनाने की परम्परा है।
  • परम्परा में कई स्त्रियाँ इस दिन अपामार्ग (चिरचिटा) की दातुन करके स्नान करती हैं।
  • पूजा मध्याह्न में की जाती है और कथा-श्रवण के बाद व्रत खोला जाता है।
  • उद्यापन: परिवार की परम्परा के अनुसार कुछ वर्षों तक व्रत करने के बाद सप्तर्षियों का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन और दान देकर उद्यापन किया जाता है।

ऋषि पंचमी कथा

कथा-स्रोत: पौराणिक — व्रत-ग्रन्थों (व्रतराज आदि) में भविष्योत्तर पुराण के नाम से उद्धृत

एक समय विदर्भ देश में उत्तंक नाम का ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था। उसके परिवार में एक पुत्र व एक पुत्री थी। ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर दिया परंतु काल के प्रभाव स्वरूप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है, और वह विधवा हो जाती है तथा अपने पिता के घर लौट आती है। एक दिन आधी रात में लड़की के शरीर में कीड़े उत्पन्न होने लगते हैं।

अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर माता-पिता दुख से व्यथित हो जाते हैं और अपनी पुत्री की इस हालत का कारण जानने का प्रयास करते हैं। उत्तंक ध्यान लगाकर अपने योगबल से उस कन्या के पूर्व जन्म का पूर्ण वृत्तान्त जान लेते हैं और कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसने एक बार रजस्वला होने पर भी घर-बर्तन इत्यादि छू लिये थे और काम करने लगी, बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं।

धर्मशास्त्रीय मान्यता में रजस्वला-काल में गृहकार्य निषिद्ध माना गया है, परंतु इसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और इसे इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। उत्तंक आगे कहते हैं कि यदि यह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करे और श्रद्धा भाव के साथ पूजा तथा क्षमा प्रार्थना करे तो उसे अपने पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे अपने पाप से मुक्ति प्राप्त होती है।

एक अन्य कथा के अनुसार यह कथा श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। कथा अनुसार जब वृत्रासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्म हत्या का महान पाप लगा तो उसने इस पाप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने उस पर कृपा करके उस पाप को चार भागों में बाँट दिया था — प्रथम भाग अग्नि की ज्वाला में, दूसरा नदियों के वर्षाकालीन जल में, तीसरा पर्वतों में और चौथा स्त्री के रज में — और इस प्रकार इन्द्र को पाप से मुक्ति प्रदान करवाई थी। परम्परागत मान्यता के अनुसार स्त्रियाँ यह व्रत रजस्वला-काल में अनजाने हुए दोषों के प्रायश्चित्त हेतु करती हैं; मूलतः यह व्रत सभी के लिए सप्तर्षियों के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।

पाठांतर: श्रीमद्भागवत (षष्ठ स्कन्ध) में इन्द्र को ब्रह्महत्या विश्वरूप के वध से लगती है और उसे पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियाँ बाँट लेते हैं; महाभारत के शान्ति पर्व में भी इसके विभाजन का भिन्न वर्णन है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — ऋषि पंचमी व्रत कथा, पृष्ठ 285–286

    कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में पुरानी (2013 की) तिथि हटाई गई, नाम, अर्थ-दोष और व्याकरण सुधारे गए तथा पाठांतर जोड़ा गया; तिथि, सप्तर्षियों के नाम, व्रत के नियम और उद्यापन वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।