शीतला षष्ठी व्रत कथा
माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी (छठी) तिथि को शीतला षष्ठी का व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से व्रती की आयु और संतान की कामना पूरी होती है। यह व्रत मुख्यतः स्त्रियाँ करती हैं; इस दिन गर्म जल से स्नान और ताज़ा पका गर्म भोजन नहीं किया जाता। कहीं-कहीं (लोक-परम्परा में) इस दिन कुत्ते को टीका लगाकर पकवान खिलाने की प्रथा भी है।
यह व्रत विशेषतः बंगाल में “शीतल षष्ठी” के नाम से, सरस्वती पूजा (वसंत पंचमी) के अगले दिन प्रचलित है; वहाँ इस दिन षष्ठी देवी की पूजा कर पिछले दिन का बना ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है, जबकि हिंदी व्रत-पुस्तकें इस दिन को शीतला माता से जोड़ती हैं। बासी भोजन की ऐसी ही परम्परा उत्तर भारत में शीतला अष्टमी (बसौड़ा) पर भी है, जो चैत्र कृष्ण अष्टमी (अमांत पंचांग में फाल्गुन कृष्ण अष्टमी) का अलग पर्व है। ओडिशा का “सीतल षष्ठी” (ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी, शिव-पार्वती विवाह का उत्सव) भी इससे भिन्न है।
तिथि: माघ शुक्ल षष्ठी (दोनों पंचांगों में समान)। व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन सूर्योदय के समय षष्ठी हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
शीतला षष्ठी व्रत विधि
व्रत के दिन उपवासक प्रातःकाल में शीघ्र उठे। सुबह उठकर, स्नान और नित्यक्रियाओं से निवृत्त होकर उसे माता शीतला देवी की पूजा करनी चाहिए। माता की पूजा इस दिन षोडशोपचार से करना कल्याणकारी रहता है। इस दिन माता को बासी भोजन का भोग लगाकर, स्वयं भी बासी भोजन ग्रहण किया जाता है। व्रत से एक दिन पूर्व ही व्रत का भोग तैयार कर लिया जाता है। परिवार के जिन सदस्यों का व्रत न हो, उनके लिये भी एक दिन पहले ही खाना बना लिया जाता है। व्रत के दिन चूल्हा न जलाने की प्रथा है। पर घर में कोई रोगी या वृद्ध हो, तो उनके लिये व्रत के दिन भोजन तैयार किया जा सकता है।
व्रत के नियम: इस दिन चूल्हा नहीं जलता, इसलिए व्रत करने वाली स्त्रियाँ पूजा के बाद पिछले दिन का बना भोजन ही प्रसाद-रूप में ग्रहण करती हैं; निर्जल उपवास इस व्रत का नियम नहीं है। अगले दिन से भोजन सामान्य रूप से बनता है।
शीतला षष्ठी व्रत कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (हिंदी व्रत-पुस्तकों में प्रचलित शीतला माता की लोक-कथा)
शीतला षष्ठी व्रत कथा के अनुसार एक समय की बात है कि एक ब्राह्मण के सात बेटे थे। उन सभी का विवाह हो चुका था, परन्तु उसके किसी बेटे की कोई संतान नहीं थी। एक बार एक वृद्धा ने ब्राह्मणी को पुत्रवधुओं से शीतला षष्ठी का व्रत कराने की सलाह दी। उस ब्राह्मणी ने श्रद्धापूर्वक व्रत कराया। व्रत के बाद एक वर्ष में ही उसकी पुत्रवधुओं को संतान की प्राप्ति हुई।
एक बार ब्राह्मणी ने व्रत में कही गई बातों का ध्यान न रखते हुए व्रत के दिन गर्म जल से स्नान कर लिया। व्रत के दिन भी ताजा भोजन खाया और व्रत के समय बताये गये विधि-नियमों का पालन नहीं किया। यही गलती ब्राह्मणी की बहुओं ने भी की। उसी रात ब्राह्मणी ने भयानक स्वप्न देखा। जब वह जागी तो उसने देखा कि उसके परिवार के सभी सदस्य मर चुके हैं। अपने परिवार के सदस्यों को देख कर वह शोक करने लगी। उसे पड़ोसियों ने बताया कि यह भगवती शीतला माता के प्रकोप से हुआ है। यह सुन ब्राह्मणी का विलाप बढ़ गया। वह रोती हुई जंगल की ओर चलने लगी। जंगल में उसे एक बुढ़िया मिली। वह बुढ़िया अग्नि की ज्वाला में तड़प रही थी। बुढ़िया ने उससे कहा कि अग्नि की जलन दूर करने के लिये मिट्टी के बर्तन में दही लेकर मेरे शरीर पर लेप करो, जिससे मेरी ज्वाला शांत हो जायेगी और शरीर स्वस्थ हो जायेगा। तब ब्राह्मणी समझ गई कि यह बुढ़िया स्वयं शीतला माता हैं। उसे अपने किए पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उसने माता से क्षमा मांगी और अपने परिवार को जीवित करने की विनती की। माता ने उसे दर्शन देकर मृतकों के सिर पर दही का लेप करने का आदेश दिया। ब्राह्मणी ने ठीक वैसा ही किया और ऐसा करने के बाद उसके परिवार के सारे सदस्य जीवित हो उठे। उस दिन से इस व्रत को संतान की कामना के लिये किया जाता है।
पाठ-भेद: बंगाल की शीतल षष्ठी से जुड़ी कथाएँ षष्ठी देवी की हैं, और शीतला अष्टमी (बसौड़ा) की कथा के भी कई रूप प्रचलित हैं; ऊपर की कथा हिंदी व्रत-पुस्तकों वाला रूप है।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — शीतला षष्ठी व्रत कथा, पृष्ठ 291–292
कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में वेब से आया परिचय-अंश हटाकर नए सिरे से लिखा गया और कथा के अर्थ-दोष सुधारे गए; तिथि, क्षेत्रीय भेद, व्रत के नियम और पाठ-भेद वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।