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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

अहोई अष्टमी व्रत कथा

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यह व्रत माताएँ अपनी सन्तान के आरोग्य और दीर्घायु की कामना से करती हैं। यह मुख्यतः उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, ब्रज) का लोक-व्रत है, जो करवा चौथ के कुछ दिन बाद और दीपावली से लगभग एक सप्ताह पहले पड़ता है।

तिथि: कार्तिक कृष्ण अष्टमी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण अष्टमी)। पूजा उस दिन होती है जिस दिन सायंकाल (तारे दिखने के समय) अष्टमी हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

व्रत-विधान एवं पूजन

इस व्रत को दिन भर निराहार रहकर स्त्रियों द्वारा किया जाता है। रात्रि में चन्द्रोदय होने के बाद दीवार पर बनी अहोई माता के चित्र के सामने किसी एक लोटे में जल भरकर रख दे। चाँदी की स्याऊ (सेही; अहोई माता का प्रतीक) की मूर्ति और दो गुड़िया रखकर उसे मौली में गूँथ ले। तत्पश्चात् रोली, अक्षत से उनकी पूजा करे। पूजा करने के बाद दूध-भात, हलवा आदि का उन्हें नैवेद्य अर्पित करे।

तदनन्तर पहले से रखे जलपूर्ण-पात्र से चन्द्रमा को अर्घ्यदान करे। (अनेक परिवारों में सायंकाल तारे दिखने पर तारों को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है; चन्द्र-अर्घ्य की परम्परा वाले परिवार चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करते हैं, जो इस अष्टमी को प्रायः अर्धरात्रि के आसपास होता है।) इसके अनन्तर हाथ में गेहूँ के सात दाने रखकर अहोई माता की कथा सुने। कथा श्रवण करने के बाद मौली में पिरोयी गयी अहोई माता को गले में पहन ले। अर्पित किये गये नैवेद्य को ब्राह्मण को दान कर दे। यदि ब्राह्मण न हो तो अपनी सास को ही दे दे। इसके अनन्तर स्वयं भोजन करे।

प्रत्येक सन्तानोत्पत्ति के पश्चात् एक-एक अहोई माता की मूर्ति बनवाकर पूर्व के गूँथे हुए मौली में बढ़ाती जाए। प्रत्येक पुत्र के विवाहोपरान्त भी इसी प्रकार की क्रिया दुहराये। जब भी गले से अहोई उतारने की आवश्यकता पड़े तो किसी शुभ दिन में उतार कर उन्हें गुड़ आदि का नैवेद्य देकर जल का आचमन कराकर रख दे। मान्यता है कि ऐसा करने से सन्तान में वृद्धि होती है। अहोई अष्टमी-पूजन के बाद ब्राह्मण को कूष्माण्ड (पेठा/कुम्हड़ा) दान करने का भी विशेष महत्त्व माना जाता है।

व्रत के नियम

व्रत प्रातः से सायंकाल की पूजा तक रखा जाता है। अधिकांश परिवारों में यह निर्जल होता है, कुछ में जल या फलाहार लिया जाता है; अपनी कुल-परम्परा के अनुसार करें।

पूजा के लिए दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र (स्याऊ और सात पुत्रों सहित) बनाया जाता है या छपा हुआ चित्र लगाया जाता है। पूजा की सामग्री: जल से भरा लोटा, चाँदी की स्याऊ और मौली, रोली, अक्षत, गेहूँ के सात दाने, दूध-भात या हलवे का नैवेद्य और बायना।

व्रत तारों (या चन्द्रमा) को अर्घ्य देकर और कथा सुनकर खोला जाता है। बायना सास या घर की किसी बड़ी स्त्री को देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

सेठ-सेठानी की कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा)

किसी नगर में साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र थे। एक दिन साहूकार की पत्नी खदान में से खोदकर मिट्टी लाने के लिए गयी। ज्यों ही उसने मिट्टी खोदने के लिए कुदाल चलाई त्योंही उसमें रह-रहे स्याऊ के बच्चे प्रहार से आहत होकर मृत हो गए। जब साहूकार की पत्नी ने स्याऊ को रक्तरंजित देखा तो उसे बच्चों के मर जाने का अत्यधिक दुःख हुआ। परन्तु जो कुछ होना था वो हो चुका था। यह भूल उससे अनजाने में हो गयी थी। अतः दुःखी मन से वह घर लौट आई। पश्चात्ताप के कारण वह मिट्टी भी नहीं लाई।

इसके बाद स्याऊ जब घर में आई तो उसने अपने बच्चों को मृतावस्था में पाया। वह दुःख से कातर हो अत्यन्त विलाप करने लगी। उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि, जिसने मेरे बच्चों को मारा है उसे भी सन्तान-शोक का दुःख भुगतना पड़े। इधर स्याऊ के श्राप से एक वर्ष के अन्दर ही सेठानी के सातों पुत्र काल-कवलित हो गए। इस प्रकार की दुःखद घटना देखकर सेठ-सेठानी अत्यन्त शोकाकुल हो उठे।

उस दम्पति ने किसी तीर्थ स्थान पर जाकर अपने प्राणों का विसर्जन कर देने का मन में संकल्प कर लिया। मन में ऐसा निश्चय कर सेठ-सेठानी घर से पैदल ही तीर्थ की ओर चल पड़े। जब तक उन दोनों का शरीर पूर्ण रूप से अशक्त न हो गया, तब तक वे बराबर आगे बढ़ते रहे। जब वे चलने में बिल्कुल असमर्थ हो गये, तो रास्ते में ही मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उन दोनों की इस दयनीय दशा को देखकर करुणानिधि भगवान् उन पर दयार्द्र हो गये और आकाशवाणी की — ‘हे सेठ! तेरी सेठानी ने मिट्टी खोदते समय अनजाने में ही सेही के बच्चों को मार डाला था। इसलिए तुझे भी अपने बच्चों का कष्ट सहना पड़ा। भगवान् ने आज्ञा दी — अब तुम दोनों अपने घर जाकर गाय की सेवा करो और अहोई अष्टमी आने पर विधि-विधान पूर्वक प्रेम से अहोई माता की पूजा करो। सभी जीवों पर दया भाव रखो, किसी का अहित न करो। यदि तुम मेरे कहने के अनुसार आचरण करोगे, तो तुम्हें सन्तान सुख प्राप्त हो जायेगा।’

इस आकाशवाणी को सुनकर सेठ-सेठानी को कुछ धैर्य हुआ और वे दोनों भगवान् का स्मरण करते हुए अपने घर की ओर चल पड़े। घर पहुँचकर उन दोनों ने आकाशवाणी के अनुसार कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। इसके साथ ईर्ष्या-द्वेष की भावना से रहित होकर सभी प्राणियों पर करुणा का भाव रखना प्रारम्भ कर दिया।

भगवत्-कृपा से सेठ-सेठानी पुनः पुत्रवान् होकर सभी सुखों का भोग करने लगे और अन्तकाल में स्वर्गगामी हुए।

साहूकार की कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा)

एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएँ एवं एक कन्या थी। उसकी बहुएँ कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता के पूजन के लिए जंगल में अपनी ननद के साथ मिट्टी लेने के लिए गयीं। मिट्टी निकालने के स्थान पर ही एक स्याऊ की माँद थी। मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से स्याऊ का बच्चा चोट खाकर मर गया। स्याऊ की माता बोली, अब मैं तेरी कोख बाँधूँगी अर्थात् अब तुझे मैं सन्तान-विहीन कर दूँगी। उसकी बात सुनकर ननद ने अपनी सभी भाभियों से अपने बदले में कोख बँधा लेने के लिए आग्रह किया, परन्तु उसकी सभी भाभियों ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। परन्तु उसकी छोटी भाभी ने कुछ सोच-समझकर अपनी कोख बँधवाने की स्वीकृति ननद को दे दी।

तदनन्तर उस भाभी को, जो भी सन्तान होती वे सात दिन के बाद ही मर जाती। एक दिन पण्डित को बुलाकर इस बात का पता लगाया गया।

पण्डित ने कहा तुम काली गाय की पूजा किया करो। काली गाय रिश्ते में स्याऊ की भायली लगती है। वह यदि तेरी कोख छोड़ दे तो बच्चे जीवित रह सकते हैं। पण्डित की बात सुनकर छोटी बहू ने दूसरे दिन से ही काली गाय की सेवा करना प्रारम्भ कर दिया। वह प्रतिदिन सुबह सवेरे उठकर गाय का गोबर आदि साफ कर देती। गाय ने अपने मन में सोचा कि, यह कार्य कौन कर रहा है, इसका पता लगाऊँगी। दूसरे दिन गाय माता तड़के उठकर क्या देखती है कि उस स्थान पर साहूकार की एक बहू झाड़ू-बुहारी करके सफाई कर रही है। गऊ माता ने उस बहू से पूछा कि तू किसलिए मेरी इतनी सेवा कर रही है और वह उससे क्या चाहती है? जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझसे माँग ले। साहूकार की बहू ने कहा — स्याऊ माता ने मेरी कोख बाँध दी है जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं। यदि आप मेरी कोख खुलवा दें तो मैं आपका बहुत उपकार मानूँगी। गाय माता ने उसकी बात मान ली और उसे साथ लेकर सात समुद्र पार स्याऊ माता के पास ले चली। रास्ते में कड़ी धूप से व्याकुल होकर दोनों एक पेड़ की छाया में बैठ गयीं।

जिस पेड़ के नीचे वह दोनों बैठी थीं उस पेड़ पर गरुड़ पक्षी का एक बच्चा रहता था। थोड़ी देर में ही एक साँप आकर उस बच्चे को मारने लगा। इस दृश्य को देखकर साहूकार की बहू ने उस साँप को मारकर एक डाल के नीचे छिपा दिया और उस गरुड़ के बच्चे को मरने से बचा लिया। इसके पश्चात् उस पक्षी की माँ ने वहाँ रक्त पड़ा देखकर साहूकार की बहू को चोंच से मारने लगी।

तब साहूकार की बहू ने कहा — मैंने तेरे बच्चे को नहीं मारा है। तेरे बच्चे को डसने के लिए एक साँप आया था, मैंने उसे मारकर तेरे बच्चे की रक्षा की है। मरा हुआ साँप डाल के नीचे दबा हुआ है। बहू की बातों से वह प्रसन्न हो गई और बोली — तू जो कुछ चाहती है मुझसे माँग ले। बहू ने उससे कहा — सात समुद्र पार स्याऊ माता रहती है, तू मुझे स्याऊ माता तक पहुँचा दे। तब उस गरुड़ पंखिनी ने उन दोनों को अपनी पीठ पर बिठाकर समुद्र के उस पार स्याऊ माता के पास पहुँचा दिया।

स्याऊ माता उन्हें देखकर बोली — आ बहिन, बहुत दिनों बाद आयी है। वह पुनः बोली मेरे सिर में जूँ पड़ गयी है, तू उसे निकाल दे। उस काली गाय के कहने पर साहूकार की बहू ने सलाई से स्याऊ माता की सारी जूँओं को निकाल दिया। इस पर स्याऊ माता अत्यन्त खुश हो गयीं। स्याऊ माता ने उस साहूकार की बहू से कहा — तेरे सात बेटे और सात बहुएँ हों। सुनकर साहूकार की बहू ने कहा — मुझे तो एक भी बेटा नहीं है, सात कहाँ से होंगे। स्याऊ माता ने पूछा — इसका कारण क्या है? उसने कहा यदि आप वचन दें तो इसका कारण बता सकती हूँ। स्याऊ माता ने उसे वचन दे दिया। वचन-बद्ध करा लेने के बाद साहूकार की बहू ने कहा — मेरी कोख तुम्हारे पास बन्द पड़ी है, उसे खोल दें।

स्याऊ माता ने कहा — मैं तेरी बातों में आकर धोखा खा गयी। अब मुझे तेरी कोख खोलनी पड़ेगी। इतना कहने के साथ ही स्याऊ माता ने कहा — अब तू घर जा। तेरे सात बेटे और सात बहुएँ होंगी। घर जाने पर तू अहोई माता का उद्यापन करना! सात-सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना। उसने घर लौटकर देखा तो उसके सात बेटे और सात बहुएँ बैठी हुई मिलीं। वह खुशी के मारे भाव-विभोर हो गयी। अहोई अष्टमी आने पर उसने सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देकर उद्यापन किया।

उस दिन उसकी जेठानियाँ परस्पर कहने लगीं — सब लोग पूजा का कार्य शीघ्र पूरा कर लो। कहीं ऐसा न हो कि, छोटी बहू अपने बच्चों का स्मरण कर रोना-धोना न शुरू कर दे। नहीं तो रंग में भंग हो जायेगा। जानकारी करने के लिए उन्होंने अपने बच्चों को छोटी बहू के घर भेजा, क्योंकि छोटी बहू रुदन नहीं कर रही थी। बच्चों ने घर जाकर बताया कि वह वहाँ आटा गूँथ रही है और उद्यापन का कार्यक्रम चल रहा है।

इतना सुनते ही सभी जेठानियाँ आकर उससे पूछने लगीं कि, तूने अपनी कोख कैसे खुलवायी। उसने कहा — स्याऊ माता ने कृपा कर मेरी कोख खोल दी। सब लोग अहोई माता की जय-जयकार करने लगे। जिस तरह अहोई माता ने उस साहूकार की बहू की कोख को खोल दिया, उसी प्रकार इस व्रत को करने वाली सभी नारियों की अभिलाषा पूर्ण करें।

अहोई अष्टमी की तीसरी कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा)

प्राचीनकाल में झाँसी के समीप दतिया नामक नगर में चन्द्रभान नामक साहूकार रहता था। उसकी पत्नी चन्द्रिका बहुत सुन्दर, सर्वगुण सम्पन्न, सती-साध्वी, शीलवन्त, चरित्रवान तथा बुद्धिमान थी। उसके कई पुत्र-पुत्रियाँ थीं, परन्तु वे सब बाल अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। इस प्रकार सन्तान के मर जाने का उन्हें बहुत दुःख था। वे पति व पत्नी नित्यप्रति मन ही मन में सोचा करते थे कि हमारे मर जाने के बाद इस अपार धन-सम्पत्ति का अधिकारी कौन होगा। एक दिन उन दोनों ने निश्चय कर लिया कि इस समस्त धन-सम्पत्ति को त्यागकर कहीं वन चलकर भजन करें। ऐसा विचार करके वे दोनों अपना सब घर-द्वार ईश्वर भरोसे पर छोड़कर जंगल को चल दिये। जब चलते-चलते थक जाते तो कुछ ठहर कर विश्राम करते और फिर चल पड़ते। इस प्रकार चलते-चलते वे दोनों बदरिकाश्रम के समीप शीतल कुण्ड पर जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन दोनों ने खान-पान आदि सब त्याग दिया और निराहार अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय कर लिया। इसी तरह बिन आहार और जल-पान के सब सात दिन व्यतीत कर दिये। तब सातवें दिन आकाशवाणी हुई कि तुम दोनों प्राणी अपने प्राण मत त्यागो। यह सब दुःख तुम्हें तुम्हारे पूर्व पापों से भोगना पड़ा है, सो अब तुम अपनी स्त्री से अहोई आठें, जो कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आए, उसी आठे को अहोई माता का व्रत और पूजन कराओ।

तब अहोई नामक देवी प्रसन्न होकर साक्षात् दर्शन देगी। तब तुम उससे अपने पुत्रों की दीर्घायु माँग लेना और व्रत के दिन तुम रात्रि को राधा कुण्ड में स्नान करना।

तत्पश्चात् इस आकाशवाणी के अनुसार चन्द्रभान की स्त्री उस चन्द्रिका ने बड़ी श्रद्धा और स्वच्छ भावना से विधि-विधान से अहोई आठें का व्रत किया और स्त्री ने राधा कुण्ड में स्नान किया। जब वे दोनों स्नान करके वापस लौटे तो उन पर प्रसन्न होकर अहोई माता ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर वर माँगने को कहा। तब उस साहूकार दम्पती ने हाथ जोड़कर कहा कि हे माता! हमारे बच्चे कम आयु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, सो आप हमारे बच्चों को दीर्घायु होने का वरदान दें। अहोई माता ‘तथास्तु’ कहकर वहीं अन्तर्धान हो गईं। इसके बाद साहूकार-साहूकारिनी लौटकर अपने घर आ गये और अहोई माता की कृपा से कुछ ही दिनों बाद पुत्रवान् हो गये और गुणवान्, बुद्धिमान पुत्र पाकर आनन्द विभोर हो गये। अहोई माता की कृपा से इस लोक में सुख भोगकर वैकुण्ठ को चले गये।

टिप्पणी

ये तीनों कथाएँ लोक-परम्परा की व्रत-कथाएँ हैं; क्षेत्र और परिवार के अनुसार इनके रूप भिन्न मिलते हैं। स्याऊ सेही (काँटेदार जन्तु) को कहते हैं, जिसे अहोई माता का प्रतीक माना जाता है। “भायली” का अर्थ सहेली है और “कोख बाँधना” का अर्थ सन्तान न होने देना। तीसरी कथा में बदरिकाश्रम और राधाकुण्ड दोनों का उल्लेख है; ब्रज में अहोई अष्टमी की रात्रि राधाकुण्ड में स्नान की परम्परा आज भी है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — अहोई अष्टमी व्रत कथा, पृष्ठ 15–20

    कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में व्याकरण, अर्थ-दोष और कथा-क्रम सुधारे गए; तिथि-नियम, व्रत के नियम और टिप्पणी के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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