गणगौर व्रत कथा
गणगौर व्रत माता गौरी (पार्वती) को समर्पित है और सुहाग एवं सौभाग्य की कामना से किया जाता है। सुहागिन और कुँवारी दोनों इसे करती हैं। यह राजस्थान का प्रमुख पर्व है और मालवा-निमाड़ (मध्य प्रदेश), गुजरात तथा हरियाणा के कुछ भागों में भी मनाया जाता है। नीचे इसकी पूजा-विधि और इससे जुड़ी पारम्परिक लोक-कथा दी गई है।
तिथि: मुख्य पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया (दोनों पंचांगों में समान)। गौरी-पूजन होली के अगले दिन — चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा) — से आरम्भ होकर लगभग 16–18 दिन चलता है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
पूजा-विधि
होली के अगले दिन से स्त्रियाँ मिट्टी (या लकड़ी) की ईसर-गौर की प्रतिमाएँ स्थापित कर प्रतिदिन प्रातः दूब, फूल और जल से उनकी पूजा करती हैं और गणगौर के पारम्परिक गीत गाती हैं।
तृतीया से एक दिन पहले सिंजारा होता है — मायके या ससुराल से मेहँदी, वस्त्र और मिठाई (राजस्थान में घेवर) की भेंट आती है।
तृतीया को परम्परा के अनुसार उपवास या एक समय भोजन किया जाता है, गौरी की विशेष पूजा कर कथा सुनी जाती है, और बाद में प्रतिमाओं को जल पिलाकर उनका जल में विसर्जन किया जाता है (कहीं-कहीं चतुर्थी को)। कई स्थानों पर इस पूजा का प्रसाद पुरुषों को नहीं दिया जाता और पूजा पति से गुप्त रखी जाती है — इसका कारण नीचे की कथा के अन्त में है।
जयपुर, उदयपुर और बीकानेर में गणगौर की सवारी निकलती है। अन्य क्षेत्रों में यही तिथि गौरी तृतीया या सौभाग्य तृतीया कहलाती है।
गणगौर व्रत कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (राजस्थान और मालवा की लोक-कथा)
एक बार भगवान शंकर तथा पार्वतीजी नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं।
भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफी विलंब हो गया। किंतु साधारण कुल की स्त्रियाँ श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं। पार्वतीजी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। तत्पश्चात उच्च कुल की स्त्रियाँ अनेक प्रकार के पकवान लेकर गौरीजी और शंकरजी की पूजा करने पहुँचीं। सोने-चाँदी से निर्मित उनकी थालियों में विभिन्न प्रकार के पदार्थ थे।
उन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वतीजी से कहा— ‘तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?’
पार्वतीजी ने उत्तर दिया— ‘प्राणनाथ! आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। इसलिए उनका रस धोती से रहेगा (अर्थात उनका सुहाग-रस वस्त्रों तक, ऊपर-ऊपर ही रहेगा)। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूँगी। यह सुहाग रस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यवती हो जाएगी।’
जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वतीजी ने अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। तत्पश्चात भगवान शिव की आज्ञा से पार्वतीजी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू की शिव-मूर्ति बनाकर पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बालू के पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया।
प्रदक्षिणा करके नदी तट की मिट्टी से माथे पर तिलक लगाकर दो कण बालू का भोग लगाया। इतना सब करते-करते पार्वती को काफी समय लग गया। काफी देर बाद जब वे लौटकर आईं तो महादेवजी ने उनसे देर से आने का कारण पूछा।
उत्तर में पार्वतीजी ने झूठ ही कह दिया कि वहाँ मेरे भाई-भावज आदि मायके वाले मिल गए थे। उन्हीं से बातें करने में देर हो गई। परंतु महादेव तो महादेव ही थे। वे कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अतः उन्होंने पूछा— ‘पार्वती! तुमने नदी के तट पर पूजन करके किस चीज का भोग लगाया था और स्वयं कौन-सा प्रसाद खाया था?’
‘स्वामी!’ पार्वतीजी ने पुनः झूठ बोल दिया— ‘मेरी भावज ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे खाकर मैं सीधी यहाँ चली आ रही हूँ।’ यह सुनकर शिवजी भी दूध-भात खाने के लालच में नदी-तट की ओर चल दिए। पार्वतीजी दुविधा में पड़ गईं। तब उन्होंने मौन भाव से भगवान भोले शंकर का ही ध्यान किया और प्रार्थना की— हे भगवन! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूँ तो आप इस समय मेरी लाज रखिए।
यह प्रार्थना करती हुई पार्वतीजी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलती रहीं। उन्हें दूर नदी के तट पर माया का महल दिखाई दिया। उस महल के भीतर पहुँचकर वे देखती हैं कि वहाँ शिवजी के साले तथा सलहज आदि सपरिवार उपस्थित हैं। उन्होंने गौरी तथा शंकर का भाव-भीना स्वागत किया। वे दो दिनों तक वहाँ रहे।
तीसरे दिन पार्वतीजी ने शिव से चलने के लिए कहा, पर शिवजी तैयार न हुए। वे अभी और रुकना चाहते थे। तब पार्वतीजी रूठकर अकेली ही चल दीं। ऐसी हालत में भगवान शिवजी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारदजी भी साथ-साथ चल दिए। चलते-चलते वे बहुत दूर निकल आए। उस समय भगवान सूर्य अपने धाम (पश्चिम) को पधार रहे थे। अचानक भगवान शंकर पार्वतीजी से बोले— ‘मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ।’
‘ठीक है, मैं ले आती हूँ।’— पार्वतीजी ने कहा और जाने को तत्पर हो गईं। परंतु भगवान ने उन्हें जाने की आज्ञा न दी और इस कार्य के लिए ब्रह्मपुत्र नारदजी को भेज दिया। परंतु वहाँ पहुँचने पर नारदजी को कोई महल नजर न आया। वहाँ तो दूर तक जंगल ही जंगल था, जिसमें हिंसक पशु विचर रहे थे। नारदजी वहाँ भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वे किसी गलत स्थान पर तो नहीं आ गए? मगर सहसा ही बिजली चमकी और नारदजी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टँगी हुई दिखाई दी। नारदजी ने माला उतार ली और शिवजी के पास पहुँचकर वहाँ का हाल बताया।
शिवजी ने हँसकर कहा— ‘नारद! यह सब पार्वती की ही लीला है।’
इस पर पार्वती बोलीं— ‘मैं किस योग्य हूँ।’
तब नारदजी ने सिर झुकाकर कहा— ‘माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती समाज में आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियाँ आपके नाम-स्मरण मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है? महामाये! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा सार्थक होता है। आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं आशीर्वाद रूप में कहता हूँ कि जो स्त्रियाँ इसी तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगलकामना करेंगी, उन्हें महादेवजी की कृपा से दीर्घायु वाले पति का संसर्ग मिलेगा।’
इसी आशीर्वाद के कारण गणगौर की पूजा स्त्रियाँ आपस में, पति से गुप्त रखकर करती हैं।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — गणगौर व्रत कथा, पृष्ठ 288–289
कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में छूटा कर्म, विराम-चिह्न और व्याकरण सुधारे गए; तिथि, पूजा-विधि और कथा के अन्त की टिप्पणी वेद पथ द्वारा लिखी गई हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।