कजली तीज व्रत कथा
कजली तीज (सातूड़ी तीज) भादों मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाने वाली स्त्रियों की तीज है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में यह कजरी गीतों वाली ‘कजरी तीज’ के रूप में, तथा राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्तू और नीमड़ी-पूजा वाली ‘सातूड़ी’ या ‘बड़ी तीज’ के रूप में प्रचलित है। नीचे इसका महत्व, पूजा-विधि एवं पारम्परिक व्रत कथा दी गई है।
तिथि: भाद्रपद कृष्ण तृतीया (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण तृतीया)। सूर्योदय के समय की तृतीया मानी जाती है और व्रत चन्द्रोदय पर खुलता है। दिनांक और चन्द्रोदय का समय स्थान के अनुसार बदलते हैं।
कजली (सातूड़ी) तीज
श्रावण शुक्ल तृतीया को हरियाली तीज का त्यौहार मनाया जाता है। उसी प्रकार से भादों मास के कृष्ण पक्ष की तीज को कजरी (कजली या कज्जली) तीज का त्यौहार मनाया जाता है। इसे ‘बड़ी तीज’ या ‘बूढ़ी तीज’ भी कहा जाता है। इस दिन माहेश्वरी वैश्य गेहूं, जौ, चने और चावल के सत्तू में घी, मेवा डालकर विभिन्न प्रकार के पकवान बनाते हैं तथा चन्द्रोदय के बाद उसी का भोजन करते हैं। इसलिए इसे ‘सातूड़ी तीज’ अथवा ‘सतवा तीज’ भी कहा जाता है।
इस दिन विशेषतौर पर गाय की पूजा की जाती है। आटे की सात लोइयां बनाकर उन पर घी, गुड़ रखकर गाय को खिलाने के बाद ही भोजन किया जाता है। कुछ लोग इस दिन हरियाली तीज की तरह सिंजारे भेजते हैं। इस दिन बहुएं अपनी सास को चीनी और रुपये का बायना निकालकर देती हैं।
कजरी गीतों की यह परम्परा खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में प्रचलित है। कजरी की प्रतिद्वंद्विता भी होती है। नावों पर चढ़कर लोग कजरी गीत गाते हैं। ब्रज के मल्हारों की ही तरह मिर्जापुर तथा बनारस का यह प्रमुख वर्षागीत माना जाता है। इस दिन घरों में मिठाई तथा पकवान बनाए जाते हैं। झूले भी डाले जाते हैं। कुछ क्षेत्रों की ग्रामीण भाषा में इसे ‘तीजा’ कहा जाता है।
पूजा-विधि
सुहागिन स्त्रियाँ दिन भर निर्जल व्रत रखती हैं; अस्वस्थ या गर्भवती स्त्रियाँ जल या फलाहार ले सकती हैं।
राजस्थान में संध्या को मिट्टी का छोटा तालाब-सा बनाकर उसके किनारे नीम की टहनी (नीमड़ी माता) रोपी जाती है और रोली, मेहँदी, काजल, वस्त्र तथा सत्तू के पिंडे से उसकी पूजा होती है। इसी कारण इसे ‘नीमड़ी तीज’ भी कहते हैं।
पूजा के बाद कथा सुनी जाती है। चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा को जल का अर्घ्य देकर सत्तू खाकर व्रत खोला जाता है।
बायना (सत्तू, मिठाई और रुपये) सास को देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। सिंजारा — मायके से आने वाली मेहँदी, वस्त्र और मिठाई की भेंट — एक दिन पहले भेजी जाती है।
कजली तीज कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (राजस्थान की सातूड़ी तीज की लोक-कथा)
एक साहूकार के चार बेटे और बहुएं थीं। तीनों बड़ी बहुएं भरे पूरे परिवार से थीं। परन्तु छोटी बहू के मायके में कोई नहीं था। बड़ी तीज पर तीनों बहुओं के घर से सत्तू आया, लेकिन छोटी बहू का मन इस विचार से दुखी हो गया कि उसके लिए सत्तू कहाँ से आएगा। उसने अपने पति से कहा कि — “मेरे लिए भी सत्तू लेकर आना, चाहे कुछ भी करना पड़े।”
उसके पति ने उसके लिए सत्तू लाने का पूरा प्रयास किया परन्तु सफलता नहीं मिली। जब वह शाम को घर लौटा और अपनी पत्नी का उदास चेहरा देखा तो वह रात भर सो न सका। दूसरे दिन तीज थी। वह रात को अंधेरे में ही घर से निकल गया और एक बनिये की दुकान में घुस गया। वहां चने की दाल लेकर चक्की में पीसना शुरू कर दिया। चक्की की आवाज सुनकर बनिये के घरवाले जाग गए। उन्होंने उसे पकड़कर पूछा — “यहां क्या कर रहे हो।”
इस पर उसने जवाब दिया कि — “कल सातूड़ी तीज है और मेरी पत्नी के पीहर में कोई नहीं है, अतः उसके लिए सत्तू चोरी करने आया हूं। आपकी दुकान में दाल, चीनी और घी सभी था, इसलिए आपके यहां से सत्तू बनाकर ले जा रहा था।”
यह सुनकर बनिया बोला — “तुम अपने घर जाओ। आज से तुम्हारी पत्नी हमारी धर्म बेटी हुई।”
वह घर लौट आया। दूसरे दिन सवेरे ही बनिये ने नौकरों के साथ चार तरह के सत्तू के पिंडे, साड़ी और अन्य पूजा का सामान उसके घर भिजवा दिया।
जेठानियां यह सब देखकर कहने लगीं कि — “तुम्हारे पीहर में तो कोई नहीं है, फिर यह सब कहां से आया।”
तब देवरानी ने उन्हें सारी बात बताकर कहा कि यह सब मेरे धर्म पिता ने भेजा है।
कथा का भाव यह है कि जिसका कोई सहारा न हो, उसकी चिन्ता करना ही धर्म है — बनिये ने एक अनजान स्त्री को धर्म-बेटी मानकर उसका त्योहार पूरा किया।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — कजली तीज व्रत कथा, पृष्ठ 253–254
कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में क्षेत्र, तिथि और वर्तनी सुधारी गई; तिथि-पंक्ति, पूजा-विधि और कथा के भाव की पंक्ति वेद पथ द्वारा लिखी गई हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।