मंगला गौरी व्रत कथा
मंगला गौरी व्रत श्रावण मास में आने वाले सभी मंगलवारों को किया जाता है। इस व्रत में गौरी जी के पूजन का विधान है। चूंकि यह मंगलवार को किया जाता है, इसीलिए इसे ‘मंगला गौरी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित स्त्रियों, विशेषकर नवविवाहिताओं, द्वारा किया जाता है; परम्परा में इसे विवाह के बाद पहले पाँच वर्ष तक रखा जाता है।
व्रत-दिन: श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार। पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) में श्रावण आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से और अमांत पंचांग (महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा) में आषाढ़ अमावस्या के अगले दिन से आरम्भ होता है, इसलिए दोनों पंचांगों में श्रावण के मंगलवार लगभग दो सप्ताह आगे-पीछे पड़ते हैं। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
पूजन विधान
इस दिन सुबह स्नानादि करके एक चौकी पर एक सफेद और एक लाल कपड़ा बिछाएं। सफेद कपड़े पर नवग्रहों के नाम की चावल की नौ ढेरियां तथा लाल कपड़े पर षोडश मातृका की गेहूं की सोलह ढेरियां बनाएं। उसी चौकी के एक तरफ चावल और फूल रखकर गणेश जी की मूर्ति की स्थापना करें। चौकी के एक कोने पर गेहूं की एक छोटी सी ढेरी रखकर उसपर जल से भरा कलश रखें। कलश में आम की एक छोटी-सी शाखा डाल दें। फिर आटे का एक चार मुंह वाला दीपक और सोलह धूप बत्ती जलाएं। फिर सबसे पहले गणेश जी का पूजन करें। उन पर चंदन, रोली, पान, सुपारी, सिंदूर, पंचामृत, जनेऊ, चावल, फूल, बेल पत्ते, इलायची, मेवा, प्रसाद तथा दक्षिणा चढ़ाकर गणेश जी की आरती करें। इसके बाद कलश का पूजन करें।
एक मिट्टी के सकोरे में आटा रखकर उस पर सुपारी रखें और दक्षिणा आटे में दबा दें। फिर बेल पत्ते चढ़ाएं। अब गणेश जी की तरह ही सब सामग्री के साथ कलश का पूजन करें। परन्तु कलश पर सिंदूर तथा बेल पत्ते न चढ़ाएँ।
इसके उपरान्त नवग्रहों अर्थात् चावल की नौ ढेरियों की पूजा करें। उसके बाद षोडश माता की बनी हुई सोलह गेहूं की ढेरियों की पूजा करें। इन पर रोली व जनेऊ न चढ़ाएँ। मेहँदी, हल्दी तथा सिंदूर चढ़ाएं। इनका पूजन भी कलश तथा गणेश जी के पूजन की तरह ही करें।
अंत में मंगला गौरी का पूजन करें। मंगला गौरी के पूजन के लिए एक थाली में चकला रख लें और उस पर मंगला गौरी की मिट्टी की मूर्ति बनाएं या मिट्टी की पांच डलियां रखकर उन्हें मंगला गौरी मान लें। आटे की लोई बनाकर रख लें। सबसे पहले मंगला गौरी को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से स्नान कराएँ। उसके उपरान्त उन्हें वस्त्र पहनाएँ, फिर नथ, काजल, सिंदूर, चंदन, हल्दी, मेहँदी आदि से शृंगार करें।
उसके बाद १६ प्रकार के फूल, १६ माला, १६ प्रकार के पत्ते, १६ फल, १६ लौंग, १६ इलायची, १६ आटे के लड्डू, १६ जीरा, १६ धनिया, सात प्रकार का अनाज (सतनजा — जैसे गेहूँ, जौ, चावल, चना, मूँग, उड़द, मसूर) सोलह मुट्ठी या सोलह ढेरी के रूप में, ५ प्रकार का मेवा, रोली, मेहँदी, काजल, सिंदूर, तेल, कंघा, शीशा, १६ चूड़ियाँ और एक रुपया अर्पित करें। फिर दक्षिणा चढ़ाकर मंगला गौरी की कथा सुनें। चौमुख दीपक बनाकर उसमें १६ तार की चार बत्ती बनाएं और कपूर से आरती उतारें। इसके बाद १६ लड्डुओं का बायना अपनी सास को देकर आशीर्वाद लें। इसके बाद बिना नमक की एक ही अनाज की रोटी का भोजन कर लें। इसके दूसरे दिन मंगला गौरी को समीप के कुएं, तालाब, नदी आदि में विसर्जित करके भोजन करें।
मंगला गौरी व्रत कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत में प्रचलित व्रत-कथा; पुस्तक में यह संक्षिप्त रूप में ही है)
मान्यता है कि जो नवविवाहित स्त्रियाँ सावन मास में मंगलवार के दिन व्रत रखकर मंगला गौरी की पूजा करती हैं, उनके पति पर आने वाला संकट टल जाता है और उन्हें लंबे समय तक दांपत्य जीवन का सुख प्राप्त होता है।
इस व्रत के विषय में कथा है कि एक सेठ का कोई पुत्र नहीं था। काफी प्रतीक्षा के बाद उसे एक संतान की प्राप्ति हुई, लेकिन उसकी आयु कम थी। सोलहवें वर्ष में सांप के काटने से उसकी मृत्यु होनी थी। संयोग से उसकी शादी एक ऐसी कन्या से हुई जिसकी मां मंगला गौरी का व्रत करती थी। इस व्रत के प्रभाव के कारण उत्पन्न कन्या के जीवन में वैधव्य का दुःख आ नहीं सकता था। इससे सेठ के पुत्र की अकाल मृत्यु टल गयी और वह दीर्घायु हो गया।
पूर्ण कथा (परम्परा में प्रचलित रूप, वेद पथ द्वारा पुनर्कथित)
ऊपर पुस्तक में दिया गया संक्षिप्त रूप है। नीचे वही कथा उस रूप में है जिसमें वह परम्परा में सुनाई जाती है; अलग-अलग क्षेत्रों में इसके विवरण कुछ भिन्न मिलते हैं।
प्राचीन समय में कुण्डिन नगर में धर्मपाल नाम का एक धनी सेठ रहता था। उसकी पत्नी सुशील और धर्मपरायण थी। घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, परन्तु संतान न होने के कारण पति-पत्नी सदा दुःखी रहते थे।
संतान की कामना से दोनों ने बहुत समय तक शिव-पार्वती की आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें पुत्र का वरदान दिया, परन्तु यह भी बता दिया कि वह बालक अल्पायु होगा और सोलहवें वर्ष में सर्प के डसने से उसकी मृत्यु होगी। समय आने पर सेठानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। पुत्र पाकर दोनों प्रसन्न तो हुए, पर उसकी छोटी आयु की चिंता उन्हें भीतर ही भीतर सताती रही।
जब पुत्र बड़ा हुआ तो धर्मपाल ने उसका विवाह एक सुशील कन्या से कर दिया। उस कन्या की माता हर वर्ष श्रावण के मंगलवारों को श्रद्धा से मंगला गौरी का व्रत और पूजन करती थी। उस व्रत के पुण्य से माता को यह आशीर्वाद मिला था कि उसकी पुत्री को अखण्ड सौभाग्य प्राप्त होगा और वह कभी विधवा नहीं होगी। विवाह के बाद वह कन्या भी अपनी माता की तरह मंगला गौरी का व्रत करने लगी।
जब पुत्र का सोलहवाँ वर्ष आया और मृत्यु की नियत घड़ी निकट आई, तब भी मंगला गौरी की कृपा से उस पर कोई आँच नहीं आई। कन्या के अखण्ड सौभाग्य के वर के आगे अकाल मृत्यु का योग टल गया। सेठ का पुत्र दीर्घायु हुआ और पति-पत्नी ने सुखपूर्वक लंबा दांपत्य जीवन बिताया।
कथा के अंत में कहा जाता है — जैसे मंगला गौरी ने उस कन्या के सौभाग्य की रक्षा की, वैसे ही इस व्रत को श्रद्धा से करने वाली स्त्रियों के सौभाग्य की रक्षा करें। मान्यता है कि इसी कारण नवविवाहिताएँ विवाह के बाद पहले वर्षों में यह व्रत रखती हैं।
संक्षिप्त विधि (अन्य परम्परा)
कुछ परिवारों में ऊपर दिए विस्तृत पूजन के स्थान पर यह संक्षिप्त विधि अपनाई जाती है। व्रत करने वाली स्त्री को माता मंगला गौरी की प्रतिमा को सामने रखकर संकल्प करना चाहिए कि वह संतान, सौभाग्य और सुख की प्राप्ति के लिए मंगला गौरी का व्रत रख रही है।
व्रती को एक आटे का दीपक बनाकर उसमें सोलह बत्तियाँ जलानी चाहिए। इसके बाद सोलह लड्डू, सोलह फल, सोलह पान, सोलह लवंग और इलायची के साथ सुहाग की सामग्री माता के सामने रखकर उनकी पूजा करें। पूजा के बाद लड्डू सासु मां को दें और शेष सामग्री किसी ब्राह्मण को दें। अगले दिन मंगला गौरी की प्रतिमा को नदी अथवा तालाब में विसर्जित कर दें।
व्रत के नियम
- व्रत के दिन पूजन के बाद एक ही बार, बिना नमक की एक ही अनाज की रोटी का भोजन किया जाता है।
- सोलह की संख्या (सोलह शृंगार) इस पूजा का मुख्य भाव है; सामग्री अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखी जा सकती है।
- मूर्ति का विसर्जन अगले दिन किया जाता है।
- महाराष्ट्र में मंगलागौर पूजा के बाद रात्रि-जागरण और पारम्परिक खेलों की प्रथा है।
ज्योतिषीय मान्यता
यह अंश व्रत-कथा का भाग नहीं, ज्योतिष की एक लोक-मान्यता है। व्रत का नाम मंगलवार और ‘मंगला’ (कल्याणकारी) गौरी से है, मंगल ग्रह से नहीं। कुछ ज्योतिषीय परम्पराओं में माना जाता है कि कुण्डली के मांगलिक योग की शांति के लिए मंगलवार का व्रत और हनुमान जी की पूजा, तथा सावन के मंगलवार को मंगला गौरी की पूजा उपयोगी है, और इसी मान्यता में पुरुष भी इस दिन मंगलवार का व्रत रखकर शिव-पार्वती की पूजा करते हैं। यह केवल मान्यता है; मांगलिक होना भय का कारण नहीं।
उद्यापन विधि
मंगला गौरी का उद्यापन सावन के सोलह या बीस मंगलवार के व्रत करने के बाद करना चाहिए। उद्यापन के दिन कुछ न खाएँ। इस दिन ब्राह्मण द्वारा हवन कराएँ, कथा सुनें और ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा दें। साथ ही अपनी सास को कपड़ा, सुहाग-पिटारी और रुपये देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। अंत में सबको भोजन कराने के उपरान्त स्वयं भी भोजन ग्रहण करें।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — मंगला गौरी व्रत कथा, पृष्ठ 219–221
पूजन विधान, कथा और उद्यापन पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारे गए और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किए गए। पुस्तक के ये पृष्ठ स्वयं वेब-सामग्री से बने हैं; अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में "आज यही शुभ व्रत है" जैसा दिनांकित वाक्य हटाया गया, ज्योतिषीय अंश कथा से अलग करके मान्यता के रूप में रखा गया, पंचामृत और व्याकरण सुधारे गए; तिथि और नियम के खंड तथा "पूर्ण कथा" (परम्परा में प्रचलित रूप का पुनर्कथन) वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।