शरद पूर्णिमा व्रत कथा
शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है और इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस रात माँ लक्ष्मी की पूजा और रात्रि-जागरण का विधान है। नीचे शरद पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि, कोजागरी लक्ष्मी पूजा और पारम्परिक व्रत कथा दी गई है।
तिथि: आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (दोनों पंचांगों में समान)। व्रत, चंद्र-पूजन और खीर का भोग उस रात होता है जिसमें चंद्रोदय और अर्धरात्रि के समय पूर्णिमा हो; यदि अगले दिन सूर्योदय पर भी पूर्णिमा रहे तो स्नान-दान अगली सुबह किया जाता है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
व्रत विधि
इस दिन प्रातःकाल स्नान करके माँ लक्ष्मी, चन्द्रदेव तथा अपने आराध्य देव को सुंदर वस्त्राभूषणों से सुशोभित करके आवाहन, आसन, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, सुपारी, दक्षिणा आदि से उनका पूजन करना चाहिए। रात्रि के समय गाय के दूध से बनी खीर में घी तथा चीनी मिलाकर अर्द्धरात्रि के समय भगवान को भोग लगाना चाहिए। पूर्ण चंद्रमा के आकाश के मध्य स्थित होने पर उनका पूजन करें तथा खीर का नैवेद्य अर्पण करके, रात को खीर से भरा बर्तन खुली चांदनी में रखकर दूसरे दिन उसका भोजन करें तथा सबको उसका प्रसाद दें।
पूर्णिमा का व्रत करके कथा सुननी चाहिए। कथा सुनने से पहले एक लोटे में जल तथा गिलास में गेहूं, पत्ते के दोने (पत्तों को जोड़कर बनाया कटोरी जैसा पात्र) में रोली तथा चावल रखकर कलश की वंदना करके दक्षिणा चढ़ाएं। फिर तिलक करने के बाद गेहूं के तेरह दाने हाथ में लेकर कथा सुनें। फिर गेहूं के गिलास पर हाथ फेरकर मिश्राणी (कथा कहने वाली ब्राह्मणी या घर की बुज़ुर्ग महिला) के पांव स्पर्श करके गेहूं का गिलास उन्हें दे दें। लोटे के जल का रात को चंद्रमा को अर्घ्य दें। शरद पूर्णिमा से ही स्नान और व्रत प्रारम्भ हो जाता है। माताएं अपनी संतान की मंगल कामना से देवी-देवताओं का पूजन करती हैं। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों में अमृत का वास होता है। पूर्णिमांत परम्परा में कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारम्भ होता है (अमांत पंचांग और कुछ वैष्णव परम्पराओं में कार्तिक मास आश्विन अमावस्या के बाद आरम्भ होता है)। विवाह होने के बाद पूर्णिमा (पूर्णमासी) के व्रत का नियम शरद पूर्णिमा से लेना चाहिए। प्रति पूर्णिमा को व्रत करने वाले इस दिन भी रात्रि में चंद्रमा का पूजन और अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं; चाँदनी में रखी खीर अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है। इस दिन शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ, राधा-दामोदर (राधा जी सहित श्रीकृष्ण का दामोदर रूप, जिसकी पूजा कार्तिक मास में होती है) पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है।
कोजागरी लक्ष्मी पूजा
“कोजागर” का अर्थ है “कौन जाग रहा है?”। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और पूछती हैं कि कौन जाग रहा है; जो जागकर उनका स्मरण करता है, उस पर उनकी कृपा होती है। इसलिए इस रात लक्ष्मी-पूजन और जागरण किया जाता है।
सामग्री: माँ लक्ष्मी का चित्र या प्रतिमा, चौकी और उस पर बिछाने के लिए लाल या पीला वस्त्र, जल से भरा लोटा या कलश, रोली, हल्दी, अक्षत, पुष्प, धूप, घी का दीपक, पान-सुपारी, दक्षिणा; खीर के लिए गाय का दूध, चावल, चीनी, घी, मेवा और इलायची; खीर को रात भर चाँदनी में रखने के लिए पात्र और उसे ढकने को पतला स्वच्छ कपड़ा; चंद्रमा के अर्घ्य के लिए जल का लोटा।
पूजा-क्रम:
- संध्या के बाद घर को स्वच्छ करके दीपक जलाएं और चौकी पर माँ लक्ष्मी का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें।
- रोली, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप से पूजन करें और खीर या दूध का नैवेद्य अर्पित करें।
- लक्ष्मी जी के मंत्र, श्रीसूक्त या लक्ष्मी-स्तोत्र का पाठ करें और रात्रि में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें।
- चंद्रोदय के बाद चंद्रदेव को अर्घ्य दें।
बंगाल और ओडिशा में इस रात कोजागरी लक्ष्मी पूजा घर-घर होती है (ओडिशा में इसे कुमार पूर्णिमा भी कहते हैं)। महाराष्ट्र में कोजागिरी पूर्णिमा पर चाँदनी में औटाया हुआ केसर-मेवे वाला दूध बांटा जाता है और जागरण होता है। मिथिला में नवविवाहितों के यहाँ कोजागरा मनाया जाता है। ब्रज और वैष्णव परम्परा में इसे श्रीकृष्ण के महारास की रात्रि माना जाता है।
शरद पूर्णिमा कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की पूर्णिमा-व्रत लोक-कथा)। यह पूर्णिमा व्रत की सामान्य कथा है, जो शरद पूर्णिमा पर विशेष रूप से कही जाती है।
एक साहूकार की दो पुत्रियां थीं। वे दोनों पूर्णमासी का व्रत करती थीं। बड़ी बहन तो पूरा व्रत करती थी पर छोटी बहन अधूरा व्रत करती थी। छोटी बहन के जो भी संतान होती, वह जन्म लेते ही मर जाती। परन्तु बड़ी बहन की सारी संतानें जीवित रहतीं। एक दिन छोटी बहन ने बड़े-बड़े पण्डितों को बुलाकर अपना दुख बताया तथा उनसे कारण पूछा। पण्डितों ने बताया— तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इसलिए तुम्हारी संतानों की अकाल मृत्यु हो जाती है। पूर्णिमा का विधिपूर्वक पूर्ण व्रत करने से तुम्हारी संतानें जीवित रहेंगी।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। कुछ समय बाद उसके लड़का हुआ, लेकिन वह भी शीघ्र ही मर गया। तब उसने लड़के को पीढ़े पर लेटाकर उसके ऊपर कपड़ा ढक दिया। फिर बड़ी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढ़ा दे दिया। बड़ी बहन जब पीढ़े पर बैठने लगी तो उसका वस्त्र बच्चे को छू गया। बच्चा वस्त्र छूते ही रोने लगा। तब गुस्सा होकर बड़ी बहन बोली— तू मुझ पर कलंक लगाना चाहती थी। यदि मैं बैठ जाती तो बच्चा मर जाता।
तब छोटी बहन उसे शांत कराते हुए बोली— यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे भाग्य से जीवित हुआ है। हम दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत करती हैं, तू पूरा करती है और मैं अधूरा, जिसके दोष से मेरी संतानें मर जाती हैं। लेकिन तेरे पुण्य से यह बालक जीवित हुआ है। इसके बाद उसने पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि आज से सभी पूर्णिमा का पूरा व्रत करें, यह संतान सुख देने वाला है।
यह पारम्परिक कथा लिए हुए व्रत को पूरी निष्ठा से निभाने का महत्व बताती है; इसे किसी संतान की मृत्यु का कारण बताने वाले तथ्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — शरद पूर्णिमा व्रत कथा, पृष्ठ 192–193
व्रत विधि और कथा पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारी गई और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गई। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में चंद्रमा की दूरी वाला तथ्य-दोष सुधारा गया; तिथि, कोजागरी लक्ष्मी पूजा और क्षेत्रीय परम्पराओं के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।