श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा
श्री वैभव लक्ष्मी व्रत माता लक्ष्मी की उपासना का शुक्रवार का व्रत है। यह आधुनिक लोक-भक्ति परम्परा का व्रत है; इसकी कथा किसी पुराण में नहीं मिलती। नीचे इस व्रत की पूजन सामग्री, पूजन-श्लोक, पूजा-विधि, नियम, उद्यापन और व्रत कथा दी गई है।
व्रत-दिन: प्रत्येक शुक्रवार। व्रत किसी भी शुक्रवार से संकल्प लेकर आरम्भ किया जा सकता है और 11 या 21 शुक्रवार तक रखा जाता है। यह साप्ताहिक व्रत है, इसलिए इसमें तिथि या पंचांग (पूर्णिमांत/अमांत) का भेद नहीं पड़ता।
पूजन सामग्री
रोली, मौली, धूप, अगरबत्ती, ऋतुफल, पान, पुष्प, पुष्पमाला, दूब, दही, शहद, घी, मेहंदी, सिंदूर, गुड़, बताशे, श्वेत वस्त्र, रक्त वस्त्र (लाल कपड़ा), हल्दी, चावल, पंचमेवा, लौंग, इलायची, श्रीफल, दीपक, रूई, माचिस, पंचपल्लव, सुपारी, समिधा (हवन हेतु लकड़ियां), हवन सामग्री, लोटा (पानी का बरतन), कटोरी, चम्मच।
वैभव लक्ष्मी पूजन मंत्र
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
— इन्द्रकृत महालक्ष्म्यष्टकम्, श्लोक 1, 7 और 8
पूजा-विधि
- शुक्रवार को प्रातः स्नान करके घर और पूजा-स्थान स्वच्छ करें और व्रत का संकल्प लें। पहले शुक्रवार को यह भी निश्चित करें कि व्रत कितने शुक्रवार (11 या 21) रखेंगे।
- मुख्य पूजा संध्या को, सूर्यास्त के बाद की जाती है। चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर माता लक्ष्मी का चित्र या प्रतिमा रखें; कई घरों में साथ में श्रीयंत्र भी रखा जाता है।
- जल से भरे कलश पर चावल से भरी कटोरी रखें और उसमें सोने या चाँदी का कोई आभूषण या सिक्का रखें।
- माता को रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। इस व्रत की परम्परा में श्वेत पुष्प और श्वेत वस्तुएँ प्रिय मानी गई हैं।
- खीर का भोग लगाएँ, ऊपर दिए पूजन-श्लोक पढ़ें, फिर व्रत कथा पढ़ें या सुनें और लक्ष्मी जी की आरती करें।
- खीर का प्रसाद सबको बाँटकर स्वयं भी ग्रहण करें।
व्रत के नियम
- यह व्रत स्त्री-पुरुष कोई भी रख सकता है।
- दिन में चाहें तो फलाहार करें; रात्रि में पूजा के बाद एक बार भोजन किया जाता है।
- व्रत के दिन घर स्वच्छ रखें, दिन में सोने और आलस्य से बचें और मन में माता का स्मरण करते रहें।
- प्रचलित परम्परा में, रजस्वला होने, सूतक, यात्रा या बीमारी के कारण कोई शुक्रवार छूट जाए तो उसे गिनती में नहीं लिया जाता; अगले शुक्रवार से व्रत आगे बढ़ाया जाता है।
उद्यापन
- संकल्प के सभी शुक्रवार पूरे होने पर अंतिम शुक्रवार को उद्यापन किया जाता है; परम्परा में इसे आवश्यक माना गया है।
- सामान्य पूजा के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार सात (या 11, 21) स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर वैभव लक्ष्मी व्रत की पुस्तक और खीर का प्रसाद भेंट किया जाता है। कथा में शीला ने भी उद्यापन पर सात स्त्रियों को पुस्तकें दी थीं।
- अंत में माता के धनलक्ष्मी स्वरूप को प्रणाम करके अपनी और सबकी मंगल-कामना की प्रार्थना करें।
श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (वैभव लक्ष्मी व्रत-पुस्तिकाओं में प्रचलित आधुनिक कथा)
एक समय की बात है कि एक शहर में एक शीला नाम की स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। शीला स्वभाव से धार्मिक प्रवृत्ति की थी। और भगवान की कृपा से उसे जो भी प्राप्त हुआ था, वह उसी में संतोष करती थी। शहरी जीवन वह जरूर व्यतीत कर रही थी, परन्तु शहर के जीवन का रंग उस पर नहीं चढ़ा था। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव और परोपकार का भाव उसमें अभी भी था।
वह अपने पति और अपनी गृहस्थी में प्रसन्न थी। आस-पड़ोस के लोग भी उसकी सराहना किया करते थे। देखते ही देखते समय बदला और उसका पति कुसंगति का शिकार हो गया। वह शीघ्र अमीर होने का ख्वाब देखने लगा। अधिक से अधिक धन प्राप्त करने के लालच में वह गलत मार्ग पर चल पड़ा। जीवन में रास्ते से भटकने के कारण उसकी स्थिति भिखारी जैसी हो गई। बुरे मित्रों के साथ रहने के कारण उसमें शराब, जुआ, रेस और नशीले पदार्थों का सेवन करने की आदत उसे पड़ गई। इन गंदी आदतों में उसने अपना सब धन गंवा दिया और शीला के गहने तक गिरवी रख दिए। नशे में वह शीला को मारता-सताता भी था।
अपने घर और अपने पति की यह स्थिति देखकर शीला बहुत दुःखी रहने लगी। परन्तु वह भगवान पर आस्था रखने वाली स्त्री थी। उसे अपने देव पर पूरा विश्वास था। एक दिन दोपहर के समय उसके घर के दरवाजे पर किसी ने आवाज दी। दरवाजा खोलने पर सामने पड़ोस की माता जी खड़ी थी। माता के चेहरे पर एक विशेष तेज था। वह करुणा और स्नेह की देवी नजर आ रही थी। शीला उस माँजी को घर के अन्दर ले आई। घर में बैठने के लिए कुछ खास व्यवस्था नहीं थी। शीला ने एक फटी हुई चादर पर उसे बिठाया। माँजी बोलीं – क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहाँ आती हूँ। इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी, फिर माँजी बोलीं – ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।’
माँजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। माँजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने माँजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई। कहानी सुनकर माँजी ने कहा – माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।’ शीला के पूछने पर माँजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। माँजी ने कहा – ‘बेटी! माँ लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।’
टिप्पणी: माँजी इस व्रत को ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ भी कहती हैं, किंतु वरलक्ष्मी व्रत श्रावण पूर्णिमा से पहले के शुक्रवार को किया जाने वाला एक भिन्न वार्षिक व्रत है।
शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने आँखें बंद करके व्रत का संकल्प किया। आँखें खोलीं तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि माँजी कहाँ गई? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि माँजी और कोई नहीं साक्षात् लक्ष्मीजी ही थीं।
दूसरे दिन शुक्रवार था। सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने माँजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई।
शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया। इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि करके सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं – ‘हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को प्रणाम किया।
व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियाँ भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा, पृष्ठ 154–159
पूजन सामग्री और कथा पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारी गई और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गई। पुस्तक का व्रत-विधि अंश एक वेब-लेख से लिया गया था; अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में वह हटाया गया, पूजा-विधि, नियम और उद्यापन वेद पथ द्वारा लिखे गए, पूजन-श्लोक महालक्ष्म्यष्टकम् के मानक पाठ से मिलाए गए, और जिन श्लोकों का शुद्ध पाठ किसी मानक स्रोत से प्रमाणित न हो सका, वे हटाए गए।
संदर्भ 1
- महालक्ष्म्यष्टकम् (sanskritdocuments.org) — इन्द्रकृत महालक्ष्म्यष्टकम्, श्लोक 1, 7, 8
पूजन-श्लोकों का पाठ इसी से मिलाया गया।
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यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।