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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

श्रीकृष्णाष्टकम्

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परिचय

यह कृष्णाष्टक आदि शङ्कराचार्यकृत है — अन्तिम श्लोक स्वयं कहता है “इति हरिरखिलात्माराधितः शंकरेण” । इसमें भगवान् विष्णु-कृष्णको सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी और धर्मकी ग्लानि होनेपर अवतार लेनेवाले रूपमें स्तुत किया गया है । गीताप्रेसके नित्यकर्म-पूजाप्रकाशमें यह पुरुषसूक्तके बाद छपा है ।

पाठ-भेद

यह पाठ गीताप्रेसके नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (पृष्ठ ३०९–३१०) के अनुसार है, और sanskritdocuments.org के doc_vishhnu/krishna8-4.itx से मिलाया गया है ।

  • Word division only, stanza ४: this edition sets “तिष्ठन् यो यमयति” with a space; the .itx sets it solid, “तिष्ठन्यो यमयति”. The text is the same.

स्रोत 1

संदर्भ 1

  • श्रीकृष्णाष्टकम् (sanskritdocuments.org) — doc_vishhnu/krishna8-4.itx

    Verification source, checked 2026-09-18. All nine stanzas compared against the .itx, which lists this as कृष्णाष्टकम् ४ (शङ्कराचार्यविरचितम्). All nine stanzas agree word for word, and the file carries the same nine. Word division only, stanza ४: this edition sets "तिष्ठन् यो यमयति" with a space; the .itx sets it solid, "तिष्ठन्यो यमयति". The text is the same.

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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