गोवर्धन (अन्नकूट) कथा
गोवर्धन (अन्नकूट) पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन की जाती है। नीचे भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करने की कथा और पूजा-विधि दी गई है।
तिथि: कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दोनों पंचांगों में समान), सामान्यतः दीपावली के अगले दिन; तिथि-क्षय या वृद्धि से कभी बीच में एक दिन का अन्तर हो जाता है। पूजा उस दिन होती है जिस दिन प्रातःकाल प्रतिपदा हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है। इसी दिन महाराष्ट्र-कर्नाटक में बलि प्रतिपदा (पाडवा) और गुजरात में नव वर्ष (बेस्तु वरस) मनाया जाता है।
गोवर्धन कथा
कथा-स्रोत: पौराणिक — श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 24–27 (पुस्तिका का पाठ इसका संक्षिप्त लोक-रूप है)
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पूजा का विधान किया गया है। इसे अन्नकूट के नाम से भी अभिहित किया जाता है। उस दिन सभी देव-मन्दिरों में अन्नकूट की सजावट की जाती है, जिसमें देवमूर्ति के समक्ष नाना प्रकार के पकवान बनाकर नैवेद्य के रूप में अर्पित किए जाते हैं। इस शृंगार को देखने के लिए मन्दिरों में उस दिन भारी भीड़ उमड़ पड़ती है।
परम्परागत मान्यता के अनुसार उस दिन ब्रजवासी नन्द बाबा के नेतृत्व में इन्द्र की पूजा किया करते थे, जिसे इन्द्रयाग कहा जाता है। एक बार भगवान श्री कृष्ण ने नन्दबाबा को इन्द्र की पूजा करने से रोक दिया। संक्षेप में, उन्होंने कहा कि ब्रजवासियों की जीविका गौओं, वनों और गोवर्धन पर्वत से चलती है, इसलिए सब लोग मिलकर इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन नाथ की पूजा करें। उनके कथनानुसार सभी ब्रजवासियों ने वैसा ही किया और नाना प्रकार के पकवानों का भोग (परम्परा में “छप्पन भोग”) लगाकर गोवर्धन नाथ की पूजा की। इसके फलस्वरूप इन्द्र देव कुपित हो गए और उन्होंने अपने मेघों को आदेश दिया कि, तुम लोग मूसलाधार वृष्टि करके समस्त ब्रजमण्डल को बहा दो। मेघों ने लगातार सात दिनों तक ब्रज पर घनघोर वर्षा की।
इस प्रकार का दृश्य देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ की कानी उंगली पर धारण कर लिया (कानी उंगली लोक-परम्परा का वर्णन है; श्रीमद्भागवत में एक हाथ से उठाने का वर्णन है)। उस विशालकाय पर्वत के नीचे सभी गोपों को सुरक्षित रखा। भगवान की इस अद्भुत लीला को देखकर आश्चर्यचकित हो इन्द्र घबरा उठा। इन्द्र को श्रीकृष्ण में ईश्वरत्व का भान हुआ। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा-याचना की और उनका दुग्धाभिषेक किया (श्रीमद्भागवत के अनुसार कामधेनु सुरभि ने अपने दूध से और इन्द्र ने ऐरावत द्वारा लाए आकाशगंगा के जल से श्रीकृष्ण का अभिषेक कर उन्हें “गोविन्द” नाम दिया)। मान्यता है कि वह अधिक दूध जिस स्थान में बहकर एकत्रित हुआ, उसे सुरभि-कुण्ड के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इन्द्र का मान-मर्दन किये जाने पर अन्नकूट को विजय-पर्व के रूप में भी देखा जाता है।
पूजा-विधि
प्रातःकाल आँगन या द्वार पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है और उसे फूलों, खील और दीयों से सजाया जाता है। रोली, अक्षत, धूप-दीप, जल, दूध और नैवेद्य से उसकी पूजा कर उसकी परिक्रमा की जाती है।
अन्नकूट के लिए अनेक प्रकार के अन्न, सब्ज़ियों और पकवानों का भोग श्रीकृष्ण को लगाकर प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है। इस दिन गायों और बैलों को नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा की जाती है। ब्रज में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्त्व है।
यह उपवास का पर्व नहीं है; अन्नकूट का प्रसाद ही इस दिन का मुख्य भोजन होता है।
टिप्पणी
यह प्रसंग विष्णु पुराण और हरिवंश में भी आता है। पुस्तिका की कथा इसका संक्षिप्त लोक-रूप है; श्रीमद्भागवत से उसकी भिन्नताएँ ऊपर कोष्ठकों में दी गई हैं।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — गोवर्धन (अन्नकूट) कथा, पृष्ठ 170
कथा पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्र (पृष्ठ 170) से उतारी गई और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गई। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में व्याकरण सुधारा गया और श्रीमद्भागवत (दशम स्कन्ध, अध्याय 24–27) से भिन्नताएँ कोष्ठकों में जोड़ी गईं; तिथि-नियम, पूजा-विधि और टिप्पणी के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।