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गोवत्स द्वादशी (बछ बारस) व्रत कथा

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गोवत्स द्वादशी अथवा बछ बारस गाय और बछड़े की पूजा का पर्व है, जिसे माताएँ अपनी सन्तान की मंगलकामना के लिए रखती हैं। महाराष्ट्र में यही दिन वसु बारस कहलाता है और वहाँ इससे दीपावली उत्सव आरम्भ होता है।

तिथि: कार्तिक कृष्ण द्वादशी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण द्वादशी), धनतेरस से एक दिन पहले। पूजा उस दिन होती है जिस दिन प्रदोषकाल (गोधूलि) में द्वादशी हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के कई भागों में “बछ बारस” भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (पूर्णिमांत; अमांत में श्रावण कृष्ण द्वादशी) को मनाई जाती है; अपनी कुल-परम्परा के अनुसार तिथि लें। नीचे इस व्रत की कथा और पूजा विधान दिया गया है।

गोवत्स द्वादशी व्रत कथा

कार्तिक कृष्ण पक्ष द्वादशी के दिन गाय और बछड़े की पूजा का विधान है। इस दिन पुत्रवती स्त्रियां व्रत भी रखती हैं। इस व्रत को कहीं गोवत्स के नाम से जाना जाता है तो कहीं बच्छदुआ के नाम से। अलग अलग प्रांतों में इस व्रत के नाम अलग हैं लेकिन व्रत का उद्देश्य और फल एक ही है। इस व्रत का उद्देश्य पुत्र की सलामती है।

गोवत्स बच्छदुआ व्रत कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा; पहला प्रसंग कृष्ण-लीला से जुड़ी मान्यता है)

एक मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण जब पहली बार गाय चराने जा रहे थे तो उनकी मैया यशोदा ने आँगन लीप कर गाय और बछड़ों की पूजा की और साथ ही श्री कृष्ण को टीका लगाया और उनकी आरती उतारी, फिर कृष्ण के साथ गायों को विदा कर दिया। श्री हरि की सभी कलाओं से युक्त परम पुरुषोत्तम भगवान कृष्णचंद द्वारा गायों को पहली बार चराने हेतु ले जाने के उपलक्ष्य में श्रद्धालु महिलाएं यह व्रत रखती हैं। (कई परम्पराओं में श्रीकृष्ण के पहली बार गाय चराने का दिन कार्तिक शुक्ल अष्टमी, अर्थात् गोपाष्टमी, माना जाता है।)

अन्य कथा के अनुसार प्राचीन काल में किसी गांव में एक बूढ़ी महिला अपनी पुत्रवधू के साथ रहती थी। पुत्रवधू अपनी सास की हर आज्ञा का पालन करती थी। एक दिन की बात है सासु मां स्नान के लिए नदी जा रही थी। जाते हुए उन्होंने कहा कि आंगन में जो घास है वह काट कर बच्छी यानी बछिया को दे दो और मच्छी यानी मछली को हांडी में पकने दे दो। बहू अपने काम में मग्न थी इसलिए सासु मां की बात को ठीक से सुन नहीं पायी और उसे लगा कि सासु ने कहा है बच्छी काटकर पकने देने के लिए, ऐसा सोचकर उसने बच्छी को मार कर हंडी में पका दिया। सास जब स्नान करके आयी तो सब बातें जानकर बहुत दुःखी हो गयी। और उसे लगा कि इस घटना के कारण उसके बेटे पर प्राण का संकट आने वाला है अतः जिद कर बैठी कि जब तक बच्छी जीवित नहीं होती वह अन्न जल ग्रहण नहीं करेगी।

सासु मां की इस जिद को देखकर बहू भी घबरा गयी और आटे की लोई से बछड़ा बनाकर व्रत और पूजन किया। व्रत और पूजा के प्रभाव से गोधूली के समय जब गाय लौटी तो उसके साथ उसकी बच्छी भी पीछे पीछे आ रही थी। इसे देखकर सास को अति प्रसन्नता हुई और उसके बेटे के जीवन पर आने वाला संकट टल गया। इस दिन से महिलाएं पुत्र की लम्बी आयु के लिए कार्तिक कृष्ण की द्वादशी तिथि को व्रत रखने लगीं, जो बच्छ दुआ व्रत के नाम से जाना जाता है।

गोवत्स व्रत पूजा विधान

इस व्रत में पूजा का विधान यह है कि व्रती नदी या तालाब में स्नान करते हैं। स्नान के बाद आटे की लोई से गाय और बछड़ा बनाया जाता है। इन गाय और बछड़ों की दीप आदि से पूजा की जाती है। संध्या के समय जब गाएं चर कर घर वापस आती हैं तब आंगन में गाय की पूजा धूप, दीप, चंदन, नैवेद्य आदि के साथ की जाती है।

इस पूजा में धान का चावल प्रयोग नहीं करना चाहिए ऐसी मान्यताएं हैं। इस व्रत में पूजा हेतु काकुन के चावल का प्रयोग अक्षत के रूप में किया जाता है। कोदो का चावल और चने की दाल तथा काकुन के चावल का भोजन इस व्रत में उत्तम माना गया है। इस व्रत में व्रत करने वालों के लिए गाय का दूध, दही, घी एवं गाय के दूध से बने पदार्थ वर्जित माने जाते हैं; इनके स्थान पर भैंस के दूध का प्रयोग किया जाता है। खान-पान के नियम क्षेत्र के अनुसार भिन्न हैं: कहीं अंकुरित मूँग, मोठ और बाजरे का भोजन किया जाता है और गेहूँ से बनी वस्तुएँ भी नहीं खाई जातीं।

व्रत संध्या की गो-पूजा के बाद खोला जाता है। यह प्रायः निर्जल नहीं होता; एक समय भोजन या फलाहार कुल-परम्परा के अनुसार किया जाता है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — गोवत्स द्वादशी (बछ बारस) व्रत कथा, पृष्ठ 271–272

    कथा और पूजा-विधान पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों (पृष्ठ 271–272) से उतारे गए और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किए गए। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में व्याकरण सुधारा गया और विवादित मान्यता को मान्यता के रूप में रखा गया; तिथि-नियम, क्षेत्रीय भिन्नताएँ और व्रत खोलने का नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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