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राधाष्टमी व्रत कथा

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी राधाष्टमी के रूप में मनाई जाती है, जो श्री राधा जी का जन्मोत्सव है। नीचे राधाष्टमी व्रत की विधि, नियम और श्री राधा जी के जन्म से जुड़ी परम्परागत कथा दी गई है।

तिथि: भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (दोनों पंचांगों में समान)। पूजा उस दिन होती है जिस दिन मध्याह्न में अष्टमी तिथि हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

व्रत विधि

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार; अमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण अष्टमी) श्री कृष्ण जन्माष्टमी कहलाती है और भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी राधा अष्टमी के नाम से विख्यात है। इसी दिन श्री महालक्ष्मी जी का व्रत भी प्रारम्भ होता है।

भगवान श्री कृष्ण के विषय में यह कहा जाता है कि जो राधा का स्मरण करता है, भगवान श्री कृष्ण उससे स्वतः प्रसन्न होते हैं। प्राचीन पुराण श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ही एकमात्र भगवान हैं, बाकी सभी उनके अंश मात्र हैं (श्रीमद्भागवत 1.3.28)। श्री राधा अष्टमी व्रत भादों मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को किया जाता है।

इस दिन राधा जी का जन्म हुआ था। इसलिए यह दिन राधा के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। व्रत के दिन राधा-कृष्ण जी की विशेष पूजा की जाती है और राधा जी को पंचामृत से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से पूजा और व्रत करने से पापों का क्षय होता है और इस लोक के साथ-साथ परलोक में भी सुख मिलता है।

भारत के सभी क्षेत्रों में भगवान श्री कृष्ण की किसी न किसी रूप में पूजा की जाती है। भगवान श्री कृष्ण के कई रूप हैं। भगवान श्री कृष्ण का सोलह हज़ार राजकुमारियों से विवाह हुआ (जिन्हें उन्होंने नरकासुर के बन्दीगृह से मुक्त कराया था), परन्तु श्री कृष्ण प्रिया केवल एक ही हैं, जिन्हें राधा के नाम से जाना जाता है। ब्रज-परम्परा के अनुसार राधा जी का जन्म रावल ग्राम (ज़िला मथुरा, उत्तर प्रदेश) में हुआ और उनका बाल्यकाल बरसाना में बीता। राधा अष्टमी का दिन एक धार्मिक पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन उत्सव और व्रत दोनों एक साथ होने के कारण श्रद्धा और हर्ष का माहौल होता है। ब्रज क्षेत्र राधा जी की लीला-भूमि रहा है, इसलिए इस अवसर पर बरसाना, रावल और वृंदावन में विशेष धूमधाम देखने को मिलती है। ऐसे में यहां पर कई मेलों का आयोजन किया जाता है और रास-रंग के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। भजन, कीर्तन और संगीत के कार्यक्रम भी अनायास ही मन मोह लेते हैं।

परम्परा में श्री राधा जी को भगवान श्री कृष्ण की आत्मा कहा गया है। राधा का निवास भगवान श्री कृष्ण के हृदय में है। वे भगवान कृष्ण की प्रेयसी भी हैं, नायिका भी हैं, और आराध्या भी हैं। यहां तक कि देवी राधा को ब्रह्मा जी व भगवान शिव के लिये भी वंदनीय कहा गया है।

राधा जन्म कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (ब्रज में प्रचलित कथा)

राधा जन्म के विषय में एक लोक-कथा प्रसिद्ध है कि एक बार राधा के पिता वृषभानु भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन एक सरोवर के निकट से गुजर रहे थे कि उन्हें एक बालिका कमल के फूल पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में अपना लिया। कहा जाता है कि राधा आयु में श्री कृष्ण से ग्यारह माह बड़ी थीं। वे बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्त थीं।

श्री राधा का जन्म दिवस बरसाना के ब्रह्मगिरि (भानुगढ़) पर्वत पर स्थित श्रीजी (लाडली जी) मंदिर में सैकड़ों वर्षों से प्रत्येक वर्ष बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस स्थान पर भाद्रपद एकादशी से लेकर भाद्रपद की चतुर्दशी के मध्य की अवधि में एक आध्यात्मिक मेले का आयोजन किया जाता है। राधा और कृष्ण से जुड़े अन्य स्थलों में भी समारोह व मेलों का आयोजन किया जाता है।

बरसाने के अलावा श्री राधा अष्टमी वृंदावन में भी धूमधाम से मनाई जाती है। यहां राधा रानी के जन्म की खुशी में नृत्य और संगीत का आयोजन किया जाता है। इस दिन यह शहर एक दुल्हन सा सुंदर प्रतीत होता है। श्री राधा अष्टमी के दिन बरसाने का राधा मंदिर फूलों से सजाया जाता है। राधा जी को लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। छप्पन भोग बनाकर राधा जी को नैवेद्य अर्पित किया जाता है। कहा जाता है कि भोग लगाने के बाद प्रसाद का कुछ अंश वहाँ मोरों को भी खिलाया जाता है।

पाठ-भेद: राधा जी के प्राकट्य के विषय में परम्पराएँ भिन्न हैं। इस लोक-कथा में वृषभानु जी को वे सरोवर में कमल पर मिलीं; कुछ ग्रन्थों में यज्ञ-भूमि शोधते समय उनके मिलने का वर्णन है; ब्रह्मवैवर्त पुराण में गोलोक से उनके अवतरण का भिन्न वर्णन है। उनकी माता का नाम कीर्ति (कीर्तिदा) था।

व्रत के नियम

  • प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें। परम्परा में राधा जी का प्राकट्य मध्याह्न में माना जाता है, इसलिए मुख्य पूजा मध्याह्न में होती है।
  • राधा जी की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र, शृंगार, फूल और भोग अर्पित करें; राधा-नाम का जप और कीर्तन करें।
  • गौड़ीय वैष्णव और इस्कॉन परम्परा में मध्याह्न तक व्रत रखकर पूजा के बाद प्रसाद लिया जाता है; कुछ परिवार दिन भर फलाहार करते हैं।
  • इसी दिन से सोलह दिन का महालक्ष्मी व्रत भी आरम्भ होता है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — राधाष्टमी व्रत कथा, पृष्ठ 179–180

    पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में जन्म-स्थान, विवाह और मंदिर-नाम के तथ्य, वर्तनी और कथा का स्रोत सुधारे गए तथा पाठ-भेद जोड़ा गया; तिथि और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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