आँवला (अक्षय) नवमी व्रत कथा
दीपावली के बाद आने वाली कार्तिक शुक्ल नवमी को आँवला (अक्षय) नवमी कहते हैं। आँवला नवमी पर आँवले के वृक्ष के पूजन का महत्व है; मान्यता है कि आँवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है। “अक्षय” का अर्थ है जिसका क्षय न हो — मान्यता है कि इस दिन किया गया दान-पुण्य अक्षय होता है, और परम्परा में इसे सत्ययुग के आरम्भ का दिन भी माना जाता है। सन्तान-प्राप्ति की कामना से भी यह पूजन किया जाता है।
तिथि: कार्तिक शुक्ल नवमी (दोनों पंचांगों में समान); वह दिन लिया जाता है जिसके पूर्वाह्न (प्रातःकाल) में नवमी हो। बंगाल और ओडिशा में इसी दिन जगद्धात्री पूजा होती है, और कुछ स्थानों पर इसे कूष्माण्ड नवमी भी कहते हैं। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
आँवला नवमी व्रत कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा)
एक लोक-कथा के अनुसार पुत्ररत्न की प्राप्ति के लिए एक दिन एक वैश्य की पत्नी ने पड़ोसन के कहने पर पराए लड़के की बलि भैरव देवता के नाम पर दे दी। इस वध का परिणाम विपरीत हुआ और उस महिला को कुष्ठ रोग हो गया तथा लड़के की आत्मा सताने लगी।
बाल वध करने के पाप के कारण शरीर पर हुए कोढ़ से छुटकारा पाने के लिए उस महिला ने गंगा माता की शरण ली और उनके कहने पर कार्तिक शुक्ल नवमी को आँवले का व्रत करना आरम्भ किया। ऐसा करने से वह भगवान की कृपा से दिव्य शरीर वाली हो गई तथा उसे पुत्र प्राप्ति भी हुई। तभी से इस व्रत को करने का प्रचलन है।
यह कथा बताती है कि किसी दूसरे के प्राण लेकर की गई कामना महापाप है, और पश्चाताप तथा भक्ति से ही उसका प्रायश्चित्त सम्भव हुआ।
पूजा विधि
आँवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में बैठकर पूजन कर उसकी जड़ में दूध देना चाहिए। इसके बाद पेड़ के चारों ओर कच्चा धागा बाँधकर कपूर या शुद्ध घी की बाती से आरती करते हुए परिक्रमा करनी चाहिए (प्रायः सात बार; कुछ परम्पराओं में 108 बार)। इसके बाद कथा सुनें और आँवले, अन्न, वस्त्र आदि का दान करें; कई स्थानों पर कुम्हड़े (कूष्माण्ड) के भीतर गुप्त दान रखने की भी परम्परा है। इस दिन महिलाएँ किसी ऐसे बगीचे में, जहाँ आँवले का वृक्ष हो, पूजन करके वृक्ष के नीचे ही भोजन करती हैं।
व्रत के नियम
- प्रातः स्नान करके आँवला-पूजन और सन्तान या परिवार के कल्याण का संकल्प लें।
- पूजन होने तक कुछ न खाएं; बहुत से व्रती पूजन के बाद आँवले के वृक्ष के नीचे बना सात्त्विक भोजन प्रसाद के रूप में एक बार ग्रहण करते हैं, कुछ दिन भर फलाहार रहते हैं।
- भोजन में आँवला अवश्य रखा जाता है, और पहले ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराकर फिर स्वयं ग्रहण किया जाता है।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — आँवला (अक्षय) नवमी व्रत कथा, पृष्ठ 311
कथा और विधि का पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्र (पृष्ठ 311) से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में व्याकरण, अंग्रेज़ी शब्द "गार्डन" और फल-कथन सुधारे गए; तिथि, माहात्म्य, कथा का भाव और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।