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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

भीष्म पंचक व्रत कथा

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भीष्म पंचक व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवप्रबोधिनी) से कार्तिक पूर्णिमा तक पाँच दिनों तक किया जाने वाला व्रत है। परम्परा के अनुसार इसका सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्ण और पितामह भीष्म से है; पद्म पुराण के कार्तिक-माहात्म्य और वैष्णव ग्रन्थ हरिभक्तिविलास में भी इस व्रत का विधान बताया जाता है। मान्यता है कि यह व्रत पापों के क्षय और उत्तम गति के लिए किया जाता है। नीचे इस व्रत की कथा, पूजा विधि और नियम दिए गए हैं।

तिथि: कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक (दोनों पंचांगों में समान)। जहाँ स्मार्त और वैष्णव एकादशी अलग-अलग दिनों पर पड़ती हैं, वहाँ वैष्णव परम्परा के व्रती अगले दिन से आरम्भ करते हैं। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

भीष्म पंचक व्रत कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा — भीष्म का शर-शय्या से उपदेश महाभारत (शान्ति और अनुशासन पर्व) में है; उसे इन पाँच दिनों और इस व्रत से जोड़ने वाला प्रसंग परम्परा में कहा जाता है, महाभारत में नहीं मिलता।

महाभारत युद्ध के बाद जब पांडवों की जीत हो गयी तब श्रीकृष्ण भगवान पांडवों को भीष्म पितामह के पास ले गये और उनसे अनुरोध किया कि आप पांडवों को अमृत स्वरूप ज्ञान प्रदान करें। भीष्म भी उन दिनों शर-शय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। कृष्ण के अनुरोध पर परम वीर और परम ज्ञानी भीष्म ने कृष्ण सहित पांडवों को राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म तथा दान-धर्म आदि का ज्ञान दिया।

परम्परा के अनुसार भीष्म द्वारा ज्ञान देने का क्रम कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि यानी पांच दिनों तक चलता रहा। भीष्म ने जब पूरा ज्ञान दे दिया तब श्रीकृष्ण ने कहा कि आपने जो पांच दिनों में ज्ञान दिया है ये पांच दिन आज से अति मंगलकारी हो गए हैं। इन पांच दिनों को भविष्य में भीष्म पंचक व्रत के नाम से जाना जाएगा। यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यदायी होगा, जो श्रद्धापूर्वक इस व्रत को रखेंगे उन्हें मृत्यु पश्चात उत्तम गति प्राप्त होगी। यह व्रत पूर्व संचित पाप कर्मों से मुक्ति प्रदान करने वाला और कल्याणकारी होगा। इस प्रकार लोक-परम्परा में भीष्म पंचक व्रत की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण से मानी जाती है।

भीष्म पंचक व्रत पूजा विधि

भीष्म पंचक व्रत में चार द्वार वाला एक मण्डप बनाया जाता है। मण्डप को गाय के गोबर से लीप कर मध्य में एक वेदी का निर्माण किया जाता है। वेदी पर तिल रखकर कलश स्थापित किया जाता है। इसके बाद भगवान वासुदेव की पूजा की जाती है। इस व्रत में एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक घी के दीपक जलाए जाते हैं। भीष्म पंचक व्रत करने वाले को पांच दिनों तक संयम एवं सात्विकता का पालन करते हुए यज्ञादि कर्म करना चाहिए। इस व्रत में गंगा पुत्र भीष्म की तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण का भी विधान है।

व्रत के नियम

  • व्रत अपनी सामर्थ्य के अनुसार लिया जाता है। वैष्णव परम्परा में कुछ लोग पाँचों दिन निराहार या केवल फल-मूल पर रहते हैं, कुछ हविष्यान्न (बिना मसाले का सात्त्विक भोजन) एक बार लेते हैं, और कुछ प्रतिदिन गाय से प्राप्त एक-एक वस्तु (गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी) ग्रहण करने का कठोर नियम रखते हैं।
  • पाँचों दिन मांस, मदिरा, प्याज-लहसुन का त्याग, ब्रह्मचर्य और भूमि-शयन का पालन किया जाता है।
  • प्रतिदिन भगवान विष्णु (वासुदेव) का पूजन, घी का दीपक और भीष्म के लिए तिल-जल से तर्पण किया जाता है।
  • पूर्णिमा की संध्या को चंद्रोदय के बाद पूजा करके व्रत का पारण किया जाता है।

ओडिशा में ये पाँच दिन “पंचुका” कहलाते हैं, जिनमें बहुत से परिवार मांसाहार का त्याग करते हैं; कार्तिक पूर्णिमा को वहाँ बोइत-बंदाण का उत्सव होता है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — भीष्म पंचक व्रत कथा, पृष्ठ 303–304

    कथा और विधि का पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में अप्रमाणित दावों को परम्परा के रूप में चिह्नित किया गया और व्याकरण सुधारा गया; तिथि, स्रोत-टिप्पणी और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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