होली (होलिका) व्रत कथा
होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन से आरम्भ होता है और अगले दिन रंगों की होली (धुलण्डी) खेली जाती है। नीचे होली पूजन की विधि एवं सामग्री — जैसी राजस्थानी-मारवाड़ी और उत्तर भारतीय घरों में प्रचलित है — तथा भक्त प्रह्लाद और होलिका से जुड़ी पारम्परिक कथा दी गई है।
तिथि: होलिका दहन फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (दोनों पंचांगों में समान) को प्रदोष काल में, भद्रा रहित समय में होता है। रंगों की होली अगले दिन — चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा) — को खेली जाती है। दिनांक और मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलते हैं।
होली पर कोई विशेष उपवास-विधान नहीं है; कुछ लोग फाल्गुन पूर्णिमा का व्रत रखकर होलिका-पूजन के बाद भोजन करते हैं। ब्रज में लठमार होली, बंगाल में दोल पूर्णिमा और दक्षिण भारत में काम-दहन के रूप में यह पर्व अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है।
होली पूजन विधि एवं सामग्री
होली के दिन सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर पहले हनुमानजी, भैरोजी आदि देवताओं की पूजा करें। फिर उन पर जल, रोली, मौली, चावल, फूल, प्रसाद, गुलाल, नारियल, चंदन आदि चढ़ाएं। दीपक से आरती करके सबको दण्डवत् प्रणाम करें। फिर सबके रोली से तिलक लगा दें और कुल में जिन देवताओं को माना जाता हो उनकी पूजा करें।
होलिका दहन तो रात्रि में होता है, परन्तु महिलाओं द्वारा सामूहिक होली की पूजा दिन में दोपहर से लेकर शाम तक की जाती है।
पहले जमीन पर गोबर और जल से चौका लगाया जाता है। चौका लगाने के बाद एक सीधी लकड़ी (डण्डा) के चारों तरफ बड़कुला (गूलरी) की माला लगा दें। उन मालाओं के आसपास गोबर की ढाल, तलवार, खिलौना आदि रख दें।
फिर जो पूजन का समय निश्चित हो उस समय जल, रोली, मौली, चावल, ढाल, फूल, गुलाल, गुड़, नारियल, कच्चे सूत की पिण्डी आदि से पूजन करने के बाद ढाल, तलवार अपने घर में रख लें। चार गूलरी (बड़कुल्ले) की माला अपने घर में पितर जी, हनुमान जी, शीतला माता तथा घर के नाम की उठाकर अलग रख दें।
यदि घर में होली न जलती हो तो सब मालाएँ, और यदि जलती हो तो एक माला, ऊख, पूजा की समस्त सामग्री, कच्चे सूत की कुकड़ी, जल का लोटा, नारियल, बूटे (हरे चने की डाली), पापड़ आदि सब सामान, जिस स्थान पर होली जलती हो वहां ले जाएं। वहां जाकर डंडी होली का पूजन करें। गूलरी की माला, नारियल आदि चढ़ा दें। फिर परिक्रमा देकर पापड़, बूटे आदि होली जलने पर भुन लें और बांट कर खा लें। ऊख घर पर वापस ले आएं।
यदि घर पर होली जलाएं तो गांव या शहर वाली होली में से ही अग्नि लाकर घर होली जलाएं। घर की होली में अग्नि लगाते ही उस लकड़ी को बाहर निकाल लें। इस डंडे को भक्त प्रह्लाद मानते हैं।
स्त्रियां होली जलते ही एक लोटे से सात बार जल का अर्घ्य देकर रोली अक्षत चढ़ायें। फिर होली के गीत तथा बधाई गाएं। पुरुष घर की होली में बूटे और जौ के बाल, पापड़ आदि भूनकर तथा उन्हें सबमें बांटकर खा लें। पूजन के बाद बच्चे और पुरुष रोली से तिलक लगाएं तथा छोटे अपने से बड़ों के पांव छूकर आशीर्वाद लें।
फिर थोड़े से तेल को सब बच्चों का हाथ लगाकर किसी चौराहे पर भैरोजी के नाम से एक ईंट पर चढ़ा दें।
होली की कथा
कथा-स्रोत: पौराणिक — श्रीमद्भागवत महापुराण, सप्तम स्कन्ध (प्रह्लाद-चरित, अध्याय 4–8); होलिका का प्रसंग लोक-परम्परा का है।
बहुत पुरानी बात है — हिरण्यकशिपु नाम का एक राक्षस था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद भगवान् का परम भक्त था। परन्तु उसका पिता भगवान् को अपना शत्रु मानता था। वह अपने राज्य में किसी को भी ईश्वर का नाम नहीं लेने देता था।
हिरण्यकशिपु ने घोर तपस्या से विपुल शक्ति का संग्रह कर देवताओं को कष्ट देना प्रारम्भ किया। इन्द्रासन पर भी अपना अधिकार कर लिया और आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।
उसे विष्णु से विशेष विद्वेष था। पुराणों के अनुसार प्रह्लाद को माता के गर्भ में ही देवर्षि नारद से भक्ति का उपदेश मिला था। एक बार गुरुओं (शण्ड और अमर्क) ने प्रह्लाद को उसकी शिक्षा की परीक्षा के लिए पिता के सामने प्रस्तुत किया, तब हिरण्यकशिपु को अपने पुत्र की भक्ति भावना का ज्ञान हुआ। उसने अपने पुत्र को ईश्वर का नाम लेने से मना किया परन्तु प्रह्लाद को ईश्वर भजन से न रोक सका।
इस पर क्रोधित होकर उसने प्रह्लाद को सर्पों की कोठरी में बंद करवाया, पहाड़ से गिरवाया, हाथी के सामने डलवाया, परन्तु वह उस भक्त का कुछ न बिगाड़ पाया। लोक-परम्परा के अनुसार अंत में उसने आदेश दिया कि मेरी बहन होलिका को बुलाओ और उससे कहो कि वह प्रह्लाद को अग्नि में लेकर बैठ जाए, जिससे प्रह्लाद जल कर मर जाएगा। होलिका को ऐसा वरदान मिला हुआ था कि अग्नि उसको जला नहीं सकती। अतः भाई की आज्ञा से वह भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर आग के ऊपर बैठ गई, लेकिन प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ और होलिका जल कर भस्म हो गई। भगवान् की कृपा से अग्नि प्रह्लाद के लिए बर्फ के समान शीतल हो गई।
तभी से होलिका जलाई जाती है।
इधर जब हिरण्यकशिपु को पता लगा कि प्रह्लाद तो बच गया और होलिका जलकर भस्म हो गई है तो अंत में निराश हिरण्यकशिपु ने क्रोधित होकर प्रह्लाद को (लोक-कथा के अनुसार) एक लोहे के खम्भे से बांध दिया और पूछा — बोल, कहां है तेरा भगवान्, जिसकी तू हमेशा रट लगाए रहता है? प्रह्लाद ने निडर होकर जवाब दिया — ‘सभी जगह तो है भगवान्।’ उसके पिता ने कहा — ‘क्या इस खम्भे में भी है? यदि है तो मैं अभी तलवार से तुम्हारे दो टुकड़े करता हूं, देखूं वह तुम्हें कैसे बचाता है?’
यह कहकर जैसे ही हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए तलवार उठाई, भगवान् विष्णु ने खम्भे को फाड़ नृसिंह रूप में अवतरित हो, अपनी जांघों पर बैठाकर हिरण्यकशिपु का नखों से पेट फाड़कर वध कर दिया और प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की।
होलिका-दहन इसी का स्मरण है कि अहंकार और अधर्म की आग में भी सच्ची भक्ति सुरक्षित रहती है।
स्रोत 2
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — होली (होलिका) व्रत कथा, पृष्ठ 101–102
पूजन-विधि और कथा का पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में अर्थ उलटने वाली भूल, पर्व के दिनों का क्रम और भागवत से असंगत टिप्पणी सुधारी गई; तिथि, उपवास और कथा-स्रोत की पंक्तियाँ वेद पथ द्वारा लिखी गई हैं।
- श्रीमद्भागवत महापुराण, सप्तम स्कन्ध — प्रह्लाद-चरित एवं नृसिंह अवतार, अध्याय 4–8
हिरण्यकशिपु की तपस्या, प्रह्लाद को गर्भ में नारद का उपदेश, उसे मारने के प्रयत्न और खम्भे से नृसिंह का प्रकट होना इसी से मिलाए गए। होलिका का प्रसंग भागवत में नहीं है; वह लोक-परम्परा का है।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।