कार्तिक स्नान पूजा कथा
कार्तिक मास भगवान विष्णु (दामोदर) का प्रिय मास माना जाता है और इसमें प्रातः गंगा या किसी पवित्र जल में स्नान का विशेष महत्व है। कार्तिक मास के व्रत आसोज (आश्विन) की पूर्णिमा, जिसे शरद पूर्णिमा भी कहते हैं, से कार्तिक की पूर्णिमा तक किये जाते हैं। नीचे कार्तिक स्नान की पारम्परिक लोक-कथा, स्नान-पूजा की विधि और मास के नियम दिए गए हैं।
तिथि: आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक (दोनों पंचांगों में समान)। कुछ परम्पराओं में कार्तिक स्नान आश्विन शुक्ल एकादशी (पापांकुशा एकादशी) से आरम्भ होता है, और अमांत पंचांग में कार्तिक मास आश्विन अमावस्या (दीपावली) के अगले दिन से गिना जाता है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
कार्तिक स्नान पूजा कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (राजस्थान-हरियाणा की लोक-कथा)
लोक-कथा के अनुसार एक सास-बहू ने कार्तिक स्नान करने का निश्चय किया। सास कार्तिक नहाने तीर्थराज (प्रयाग) जाने लगी तो बहू ने भी साथ जाने की इच्छा व्यक्त की। सास ने बहू को यह कहते हुए मना कर दिया कि अभी तुम्हारी कार्तिक नहाने की उम्र नहीं है, तुम बाद में जाना। यह कह कर सास तीर्थ चली गई। सास के जाने के बाद बहू ने कुम्हार के यहां से तैंतीस मिट्टी के कुण्ड मंगवा कर रख लिए। वह रोजाना रात में एक कुण्ड पानी से भर कर रख लेती और सवेरे जल्दी उठ स्नान कर कुण्ड को छत पर उल्टा रख कर विधि-विधान से पूजा करती।
इधर एक दिन सास की नथ नहाते हुए गंगा जी में गिर गई। उधर बहू हमेशा की तरह नहाते समय बोली — “सास नहाए उड़ै मैं नहाऊं कुण्डे।” (अर्थात् सास वहाँ तीर्थ में नहाए, मैं यहाँ कुण्डे में नहाऊँ।) उसी समय अचानक गंगा जी की धारा बहू के कुण्ड में आई। उसी में उसकी सास की नथ भी आ गई। बहू ने कुण्ड में आई नथ को देखा तो वह पहचान गई कि यह तो सास की है। इस तरह दोनों को नहाते हुए पूरा एक महीना बीत गया।
सास जब वापस लौट कर अपने घर आई तो बहू ने सास की खूब आवभगत की। उसी समय सास ने देखा कि उसकी गंगा में खोई हुई नथ बहू ने पहन रखी है तो पूछा — यह नथ तुम्हारे पास कहां से आई? बहू ने सास को पूरी घटना बता दी कि किस प्रकार कुण्ड में गंगा जी की धारा के साथ नथ आ गई थी। सास को इस घटना पर बहुत अचरज हुआ लेकिन वह चुप रही।
कार्तिक स्नान के बाद सास ने पंडितों को भोजन कराने की इच्छा व्यक्त करते हुए बहू से कहा — मुझे पंडितों को भोजन कराना है। इस पर बहू ने सास से विनती की कि माँ जी, आप चार पंडितों को भोजन कराना चाहती हैं तो मेरे भी दो जोड़ दें क्योंकि मैंने भी कार्तिक स्नान किया है। बहू की बात सुन कर सास ने कहा — तुम कहां कार्तिक नहाई हो, गंगा तीर्थ तो मैं जाकर आई हूं। तब बहू ने सास को छत पर ले जाकर वह कुण्ड दिखाए जिसमें उसने कार्तिक स्नान किया था।
सास ने देखा कि मिट्टी के वे कुण्ड सोने के हो गए हैं। यह देख सास ने बहू से कहा — बहू, तुम्हारा भाग्य अच्छा है जो गंगा की धारा कुण्ड में आ गई, सारे कुण्ड सोने के हो गए। मैं अहंकार वश तीर्थ गई थी लेकिन वहां भी मुझे कुछ नहीं मिला। तुमने सच्ची भक्ति भाव से कार्तिक स्नान किया है इसलिए भगवान ने तुम्हें इतना सब कुछ यहीं दे दिया।
स्नान और पूजा-विधि
- पूरे मास प्रतिदिन सूर्योदय से पहले (ब्राह्म मुहूर्त में) उठकर नदी, सरोवर या घर पर ही स्वच्छ जल में स्नान करें; पहले दिन मास भर स्नान का संकल्प लें।
- स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु (दामोदर) तथा तुलसी का पूजन करें।
- संध्या को तुलसी के पास, मंदिर में और घर के द्वार पर दीपदान करें।
- कथा सुनें या पढ़ें; कई घरों में स्त्रियाँ मिलकर प्रतिदिन कार्तिक की कथाएँ कहती हैं।
व्रत के नियम
- मास भर सात्त्विक भोजन करें; बहुत से लोग एक समय भोजन करते हैं और प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा का त्याग करते हैं।
- ब्रह्मचर्य, भूमि-शयन और संयमित वाणी का पालन परम्परा में बताया गया है; अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियम लें।
- वैष्णव परम्परा में इसे दामोदर मास कहते हैं और प्रतिदिन दामोदर-दीपदान किया जाता है।
उद्यापन
कार्तिक पूर्णिमा को अंतिम स्नान के बाद भगवान विष्णु का पूजन, हवन या कथा करें, ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र और दीप का दान करें।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — कार्तिक स्नान पूजा कथा, पृष्ठ 243
कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्र (पृष्ठ 243) से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में कथा को लोक-कथा के रूप में चिह्नित किया गया और एक टूटा वाक्य सुधारा गया; तिथि, विधि, नियम और उद्यापन के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।