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नृसिंह जयंती व्रत कथा

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नृसिंह जयंती वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है और यह दिन भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार को समर्पित है। नीचे इस व्रत की पारम्परिक कथा, पूजा-विधि और व्रत के नियम दिए गए हैं।

तिथि: वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (दोनों पंचांगों में समान)। जयंती उस दिन मनाई जाती है जिस दिन सायंकाल में चतुर्दशी तिथि हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

नृसिंह जयंती व्रत कथा

कथा-स्रोत: पौराणिक — श्रीमद्भागवत महापुराण, सप्तम स्कन्ध (होलिका का प्रसंग होली से जुड़ी लोक-परम्परा से है)

हिन्दू पंचांग के अनुसार नृसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को (सायंकाल में चतुर्दशी रहने पर) मनाया जाता है। (संपादकीय टिप्पणी: मूल पुस्तिका में भूलवश “चतुर्थी” छपा है।) पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लिया था। जिस कारणवश यह दिन भगवान नृसिंह के जयंती रूप में बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान नृसिंह जयंती की व्रत कथा इस प्रकार से है—

कथानुसार अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु (भगवान वराह द्वारा) का बदला लेने के लिए राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह न मनुष्य से मरे न पशु से, न दिन में न रात में, न घर के भीतर न बाहर, न पृथ्वी पर न आकाश में, और न किसी अस्त्र-शस्त्र से। वरदान प्राप्त करते ही अहंकारवश वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा और उन्हें तरह-तरह की यातनाएँ और कष्ट देने लगा। जिससे प्रजा अत्यंत दुखी रहती थी। इन्हीं दिनों हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी बचपन से ही श्री हरि भक्ति से प्रह्लाद को गहरा लगाव था।

हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद का मन भगवद्भक्ति से हटाने के लिए कई असफल प्रयास किए, परन्तु वह सफल नहीं हो सका। एक बार उसने अपनी बहन होलिका की सहायता से उसे अग्नि में जलाने का प्रयास किया (होली से जुड़ी परम्परा के अनुसार), परन्तु प्रह्लाद पर भगवान की असीम कृपा होने के कारण उसे मायूसी ही हाथ लगी। अंततः एक दिन उसने प्रह्लाद को तलवार से मारने का प्रयास किया, तब भगवान नृसिंह (आधे मनुष्य, आधे सिंह) खम्भे से प्रकट हुए और संध्या के समय देहली पर बैठकर हिरण्यकशिपु को अपनी जाँघों पर रखकर अपने नखों से उसका सीना फाड़ दिया और अपने भक्त की रक्षा की।

भक्तों के अनुसार इस दिन यदि कोई व्रत रखते हुए श्रद्धा और भक्तिपूर्वक भगवान नृसिंह की सेवा-पूजा करता है तो वह सभी जन्मों के पापों से मुक्त होकर प्रभु के परमधाम को प्राप्त करता है।

पूजा-विधि

  • व्रत के दिन प्रातः स्नान करके मध्याह्न में व्रत का संकल्प लें।
  • सायंकाल (संध्या समय), जब भगवान नृसिंह का प्राकट्य माना जाता है, भगवान नृसिंह और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र का पूजन करें: जल, चंदन, फूल, तुलसी-दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • यह कथा पढ़ें या सुनें और आरती करें। कई भक्त रात्रि में जागरण और भजन-कीर्तन करते हैं।
  • आंध्र प्रदेश के अहोबिलम और सिंहाचलम जैसे नृसिंह-क्षेत्रों तथा इस्कॉन मंदिरों में यह पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है।

व्रत के नियम

  • व्रत के नियम एकादशी जैसे माने जाते हैं: अन्न नहीं लिया जाता; अपनी सामर्थ्य के अनुसार फलाहार या निर्जल व्रत रखा जाता है।
  • पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, चतुर्दशी तिथि समाप्त होने पर, दान देकर किया जाता है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — नृसिंह जयंती व्रत कथा, पृष्ठ 280

    कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में पुस्तिका की गलत तिथि (चतुर्थी के स्थान पर चतुर्दशी), वरदान और वध के तथ्य तथा व्याकरण सुधारे गए; तिथि, पूजा-विधि और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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