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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

शत अपराध शमन व्रत कथा

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हम मनुष्य कर्मों से बंधे हुए हैं। अपने कर्म के अनुसार हमें उसका फल भी भोगना होता है। अच्छे कर्म का अच्छा फल मिलता है और अपराध के लिए दंड भी मिलता है। हमसे जाने अनजाने अपराध भी हो जाता है। ईश्वर अपनी संतान का अपराध क्षमा कर देता है जब उसकी संतान अपराध मुक्ति के लिए प्रार्थना करती है एवं अपराध शमन के लिए व्रत करती है।

तिथि: मार्गशीर्ष मास से आरम्भ कर वर्ष भर, दोनों पक्षों की द्वादशी (भविष्य पुराण के अनुसार द्वादशी के स्थान पर अमावस्या या अष्टमी भी ली जा सकती है)। पूर्णिमांत पंचांग में मार्गशीर्ष मास कृष्ण पक्ष से और अमांत पंचांग में शुक्ल पक्ष से आरम्भ होता है, इसलिए पहली द्वादशी दोनों में अलग पड़ती है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है। भविष्य पुराण में इसी व्रत का नाम “अपराधशत-व्रत” है।

शत अपराध शमन व्रत माहात्म्य

शत अपराध शमन व्रत मार्गशीर्ष मास में द्वादशी के दिन शुरू होता है। इस तिथि से प्रत्येक द्वादशी के दिन इस व्रत को करने का विधान है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति द्वारा जाने-अनजाने किये गये शत अपराधों का शमन होता है और व्यक्ति अपराध मुक्त हो कर मृत्यु के पश्चात् ईश्वर के समक्ष पहुंचता है जिससे सुख और उत्तम गति को प्राप्त होता है। पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने इस व्रत के महत्व के विषय में कहा है कि यह व्रत अनंत व इच्छित फल देने वाला है, और इसे करने वाला धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का भागी होता है।

शत अपराध शमन व्रत कथा

कथा-स्रोत: पौराणिक — भविष्य पुराण, उत्तर पर्व, अध्याय 146 (अपराधशत-व्रत; श्रीकृष्ण–युधिष्ठिर संवाद के भीतर वशिष्ठ–इक्ष्वाकु संवाद)

एक समय की बात है राजा इक्ष्वाकु ने परम श्रद्धेय महर्षि वशिष्ठ जी से प्रश्न किया — “हे गुरुदेव! हम लाख चाहने के बावजूद जाने अनजाने अपने जीवन में शताधिक पापकर्म तो अपने सम्पूर्ण जीवन में कर ही लेते हैं। ये अपराध मृत्यु के उपरान्त हमारे लिए और फिर हमारे वंशजों के लिए भी दुःख का कारण होते हैं। हे महाप्रभो! क्या कोई ऐसा व्रत है जिसको करने से सभी प्रकार के पाप मिट जाएं और हमें महाफल की प्राप्ति हो।” राजा की बातों को सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने कहा, हे राजन्! एक व्रत ऐसा है जिसको विधि पूर्वक करने से शताधिक पापों का शमन होता है।

महर्षि ने राजा को शत अपराध बताते हुए कहा कि हे राजन्! शास्त्रों में जो शत अपराध बताये गये हैं उनके अनुसार किसी भी आश्रम के धर्म में न रहना, नास्तिकता, हवन कर्म का परित्याग, अशौच, निर्दयता, लोभवृत्ति, ब्रह्मचर्य का पालन न करना, व्रत का पालन न करना, अन्न दान और आशीष न देना, अमंगल कार्य करना, हिंसा, चोरी, असत्यवादिता, इन्द्रियपरायणता, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, घमंड, प्रमाद, किसी को दुःख पहुँचाने वाली बात कहना, शठता, क्षमाहीनता, कष्ट देना, प्रपंच, वेदों की निंदा करना, नास्तिकता को बढ़ावा देना, माता को कष्ट देना, पुत्र एवं अपने आश्रितों के प्रति कर्तव्य का पालन न करना, अपूज्य की पूजा करना, जप में अविश्वास, पंच यज्ञ का पालन न करना, संध्या-हवन-तर्पण नहीं करना, ऋतुकाल के बिना स्त्री-संसर्ग करना, पर्व आदि में स्त्री संग सहवास करना, परायी स्त्री के प्रति आसक्त होना, वेश्यागमन करना, पिशुनता, अंत्यजसंग, अपात्र को दान देना, माता-पिता की सेवा न करना, पुराणों का अनादर करना, मांस मदिरा का सेवन करना, अकारण किसी से लड़ना, बिना विचारे काम करना, स्त्री से द्रोह रखना, कई पत्नी रखना, मन पर काबू न रखना, शास्त्र का पालन न करना, लिया गया धन वापस न करना, गुरु द्वारा दिये गये ज्ञान को भूलना, पत्नी अथवा पुत्र और पुत्री को बेचना, बिलों में पानी डालना, जल क्षेत्र को दूषित करना, वृक्ष काटना, भीख मांगना, स्ववृत्ति का त्याग करना, विद्या बेचना, कुसंगति, गो-वध, स्त्री-हत्या, मित्र-हत्या, भ्रूणहत्या, दूसरे के अन्न मांग कर गुजर करना, विधि का पालन न करना, कर्म से रहित होना, विद्वान का याचक होना, वाचालता, प्रतिग्रह लेना, संस्कार हीनता, स्वर्ण चोरी करना, ब्राह्मण का अपमान और हत्या करना, गुरु पत्नी से संसर्ग करना, पापियों से सम्बन्ध रखना, कमजोर और मजबूरों की मदद न करना — ये सौ अपराधों में से प्रमुख हैं।

भविष्य पुराण (उत्तर पर्व, अध्याय 146) में महर्षि वशिष्ठ पूरे सौ अपराध इन श्लोकों में गिनाते हैं —

न करोति नरो मोहाद्व्रतमेतद्दिनेदिने ।
अनाश्रमित्वं प्रथमोऽनग्निता व्रतहीनता ॥ ६ ॥
अदातृत्वमशौचं च निर्दयत्वं स्पृहालुता ।
अक्षांतिर्जनपीडा च मायित्वमप्यमंगलम् ॥ ७ ॥
क्षतव्रतत्वं नास्तिक्यं वेदनिंदा कठोरता ।
असत्यता हिंसकत्वं स्तैन्यमिन्द्रियविप्लवः ॥ ८ ॥
मनसोऽनिग्रहश्चैव क्रोध ईर्ष्याथ मत्सरः ।
दंभः शाठ्यं च धौर्त्यं च कटुकोक्तिः प्रमादता ॥ ९ ॥
भार्यामातृसुतादीनां त्यागश्चापूज्य पूजनम् ।
श्राद्धहानिर्जपत्यागः पंचयज्ञविवर्जनम् ॥ १० ॥
संध्यातर्पणहोमानां हानिरग्नेः प्रणाशनम् ।
अनृतौ मैथुनं पार्थ पर्वण्यपि च मैथुनम् ॥ ११ ॥
पैशुन्यं परदारेषु दानं वेश्याभिगामिता ।
अपात्रदानं चाल्पं च मूलिकाकुलिभक्षणम् ॥ १२ ॥
अंत्यजागमनं मातृत्यागः पितृविवर्जनम् ।
पित्रोरभक्तिर्वादश्च पुराणस्मृतिवर्जनम् ॥ १३ ॥
अभक्ष्यभोजनं चापि पतिद्रोहोऽविचारता ।
कृषिकर्मक्रियावाहं भार्यासंग्रहकारिता ॥ १४ ॥
इंद्रियाजयमायित्वं विद्याविस्मरणं तथा ।
शास्त्रत्याग ऋणं चित्रकर्म चानंगधावनम् ॥ १५ ॥
भार्यापुत्रसुतादीनां विक्रयः पशुमैथुनम् ।
इन्धनार्थं द्रुमच्छेदो बिले वार्यादिपूरणम् ॥ १६ ॥
तडागागमने वृत्तं विद्याविक्रयकारिता ।
वृत्तिलोपो महीपाल याचकत्वं कुमित्रता ॥ १७ ॥
स्त्रीवधो गोवधश्चैव पौरोहित्यं सुहृद्वधः ।
भ्रूणहत्या परान्नं च शूद्रान्नस्य निषेवणम् ॥ १८ ॥
शूद्रस्य चाग्निकर्मत्वमविधित्वं कुपुत्रता ।
विद्वद्भ्यो याचकत्वं हि वाचाटत्वं प्रतिग्रहः ॥ १९ ॥
श्रौतसंस्कार दीनत्वमार्तत्राणविवर्जनम् ।
ब्रह्महत्यासुरापानरुक्मस्तैन्यमतः परम् ॥ २० ॥
गुरुदाराभिगामित्वं संयोगश्चापि तैः सह ।
अपराधशतं त्वेतत्कथितं ते मयानघ ॥ २१ ॥

इसके बाद महर्षि कहते हैं कि ये प्रधान अपराध कहे गए हैं; इनके अतिरिक्त भी अनगिनत अपराध हैं, जो भगवान सत्येश के पूजन से नष्ट होते हैं (श्लोक 22–24)। यह सूची पारम्परिक धर्मशास्त्रीय संदर्भ की है; इसके कुछ अंश, जैसे जाति से जुड़े निषेध, उस काल की सामाजिक मान्यताओं को दर्शाते हैं।

महर्षि वशिष्ठ ने कहा हे महाबाहो इक्ष्वाकु इन अपराधों से मुक्ति के लिए भगवान सत्यदेव की पूजा करनी चाहिए। भगवान सत्यदेव (सत्येश) अपनी प्रिया लक्ष्मी के साथ क्षीरसागर में अर्धचन्द्र पर स्थित कमल की कर्णिका पर शोभायमान हैं। इनके पूर्व में वामदेव, दक्षिण में नृसिंह, पश्चिम में कपिल, उत्तर में वराह एवं ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) अच्युत भगवान स्थित हैं — यह ब्रह्मपंचक कहलाता है — जो अपने भक्तों का सदैव कल्याण करते हैं। शंख, चक्र, गदा व पद्म से युक्त भगवान सत्यदेव, जिनकी जया, विजया, जयंती, पापनाशिनी, उन्मीलिनी, वंजुली, त्रिस्पृशा एवं विवर्धना आठ शक्तियाँ हैं, और जिनके चरणों के नीचे से पवित्र गंगा निकली है। भक्तवत्सल भगवान सत्यदेव की पूजा मार्गशीर्ष से शुरू करनी चाहिए और प्रत्येक पक्ष की द्वादशी के दिन विधि पूर्वक पूजा करके व्रत करना चाहिए।

शत अपराध शमन व्रत विधान

दोनों पक्ष की द्वादशी तिथि को नित्य क्रियाओं के पश्चात् स्नान करके भगवान सत्यदेव की पूजा एवं व्रत का संकल्प करना चाहिए। संकल्प के बाद भगवान सत्यदेव और देवी लक्ष्मी की स्वर्ण प्रतिमा दूध से भरे कलश पर स्थापित करके सबसे पहले इनकी अष्ट शक्तियों की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद लक्ष्मी सहित भगवान सत्यदेव की षोडशोपचार सहित पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा सहित विदा करना चाहिए। वर्ष पर्यन्त दोनों पक्षों में इस व्रत का पालन करने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा एवं स्वर्ण प्रतिमा ब्राह्मण को देना चाहिए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

व्रत के नियम

  • भविष्य पुराण के अनुसार व्रती उस दिन उपवास रखकर, शुद्ध मन से पूजा करता है।
  • पारण: अगले दिन प्रातः स्नान-पूजा के बाद व्रत खोला जाता है।
  • पुराण के अनुसार समर्थ और असमर्थ दोनों यह व्रत भक्ति से, धन में कंजूसी किए बिना, अपनी सामर्थ्य के अनुसार कर सकते हैं।
  • उद्यापन के अंत में व्रती ब्राह्मण से अनुमति माँगता है और ब्राह्मण “पापध्वंसोऽस्तु” (तुम्हारे पापों का नाश हो) कहकर आशीर्वाद देता है।

स्रोत 2

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — शत अपराध शमन व्रत कथा, पृष्ठ 307–308

    कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में पाठ को भविष्य पुराण (उत्तर पर्व, अध्याय 146) से मिलाकर दिशाओं, शक्तियों के नाम और अपराध-सूची के दोष सुधारे गए और सौ अपराधों के मूल श्लोक जोड़े गए; तिथि और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

  • भविष्य पुराण, उत्तर पर्व (संस्कृत विकिस्रोत) — अध्याय 146 — अपराधशत-व्रत वर्णन, श्लोक 1–60

    सौ अपराधों के श्लोक (6–21) यहीं से अक्षरशः लिए गए; सत्येश का स्वरूप, आठ शक्तियाँ, आरम्भ-तिथि और उद्यापन इसी अध्याय से मिलाए गए।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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