तुलसी विवाह व्रत कथा
तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल पक्ष में देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी अथवा द्वादशी को, अपनी परम्परा के अनुसार, शालिग्राम (भगवान विष्णु) और तुलसी के विवाह के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णु चार मास की योगनिद्रा से जागते हैं, और इसी के साथ विवाह आदि शुभ कार्य फिर आरम्भ होते हैं। नीचे इससे जुड़ी दो पारम्परिक कथाएं, तुलसी विवाह की पूजन विधि और व्रत के नियम दिए गए हैं।
तिथि: कार्तिक शुक्ल एकादशी या द्वादशी (दोनों पंचांगों में समान)। अनेक पंचांग तुलसी विवाह द्वादशी को देते हैं, कई परिवार इसे एकादशी की संध्या को ही करते हैं, और महाराष्ट्र-गुजरात सहित कई स्थानों पर यह उत्सव द्वादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन किया जाता है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
श्री तुलसी विवाह कथा
कथा-स्रोत: पौराणिक — जालंधर-वृंदा प्रसंग शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध खण्ड) और पद्म पुराण में मिलता है; ब्रह्मवैवर्त पुराण में तुलसी और शंखचूड़ का भिन्न प्रसंग है। यहाँ पुस्तिका का संक्षिप्त रूप दिया गया है।
प्राचीन काल में जालंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ बड़ा उत्पात मचा रखा था। वह बड़ा वीर तथा पराक्रमी था। उसकी वीरता का रहस्य था, उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। उसी के प्रभाव से वह सर्वजयी बना हुआ था। जालंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गये तथा रक्षा की गुहार लगाई। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया। वे जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के पास गए, और वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर उनका स्पर्श किया; इससे उसका पतिव्रत भंग हो गया। उधर, उसका पति जालंधर, जो देवताओं से युद्ध कर रहा था, वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही मारा गया। जब वृंदा को इस बात का पता लगा तो क्रोधित होकर उसने भगवान विष्णु को शाप दे दिया, ‘जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया है, उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छलपूर्वक हरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे।’ यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। जिस जगह वह सती हुई वहाँ तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। एक अन्य प्रसंग के अनुसार वृंदा ने विष्णु जी को यह शाप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है, अतः तुम पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, ‘हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।’ बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। कुछ परम्पराओं में शालिग्राम और तुलसी के विवाह को भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीक माना जाता है।
तुलसी विवाह व्रत कथा
कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा)
लोक-परम्परा में तुलसी विवाह से जुड़ी अनेक कथाएं कही जाती हैं। उनमें से एक लोक-कथा इस प्रकार है। इस कथा के अनुसार एक कुटुम्ब में ननद तथा भाभी साथ रहती थीं। ननद का विवाह अभी नहीं हुआ था। वह तुलसी के पौधे की बहुत सेवा करती थी। लेकिन उसकी भाभी को यह सब बिलकुल भी पसन्द नहीं था। जब कभी उसकी भाभी को अत्यधिक क्रोध आता तब वह उसे ताना देते हुए कहती कि जब तुम्हारा विवाह होगा तो मैं तुलसी ही बारातियों को खाने को दूंगी और तुम्हारे दहेज में भी तुलसी ही दूंगी।
कुछ समय बीत जाने पर ननद का विवाह पक्का हुआ। विवाह के दिन भाभी ने अपनी कथनी अनुसार बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़ दिया और खाने के लिए कहा। तुलसी की कृपा से वह फूटा हुआ गमला अनेकों स्वादिष्ट पकवानों में बदल गया। भाभी ने गहनों के नाम पर तुलसी की मंजरी से बने गहने पहना दिए। वह सब भी सुन्दर सोने-जवाहरात में बदल गए। भाभी ने वस्त्रों के स्थान पर तुलसी का जनेऊ (तुलसी के डंठलों से बना धागा) रख दिया। वह रेशमी तथा सुन्दर वस्त्रों में बदल गया।
ननद की ससुराल में उसके दहेज की बहुत प्रशंसा की गई। यह बात भाभी के कानों तक भी पहुंची। उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उसे अब तुलसी माता की पूजा का महत्व समझ आया। भाभी की एक लड़की थी। वह अपनी लड़की से कहने लगी कि तुम भी तुलसी की सेवा किया करो। तुम्हें भी बुआ की तरह फल मिलेगा। वह जबर्दस्ती अपनी लड़की से सेवा करने को कहती लेकिन लड़की का मन तुलसी सेवा में नहीं लगता था।
लड़की के बड़ी होने पर उसके विवाह का समय आता है। तब भाभी सोचती है कि जैसा व्यवहार मैंने अपनी ननद के साथ किया था वैसा ही मैं अपनी लड़की के साथ भी करती हूं तो यह भी गहनों से लद जाएगी और बारातियों को खाने में पकवान मिलेंगे। ससुराल में इसे भी बहुत इज्जत मिलेगी। यह सोचकर वह बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़ देती है। लेकिन इस बार गमले की मिट्टी, मिट्टी ही रहती है। मंजरी तथा पत्ते भी अपने रूप में ही रहते हैं। जनेऊ भी अपना रूप नहीं बदलता है। सभी लोगों तथा बारातियों द्वारा भाभी की बुराई की जाती है। लड़की के ससुराल वाले भी लड़की की बुराई करते हैं।
भाभी कभी ननद को नहीं बुलाती थी। भाई ने सोचा मैं बहन से मिलकर आता हूं। उसने अपनी पत्नी से कहा और कुछ उपहार बहन के पास ले जाने की बात कही। भाभी ने थैले में ज्वार भरकर कहा कि और कुछ नहीं है तुम यही ले जाओ। वह दुखी मन से बहन के पास चल दिया। वह सोचता रहा कि कोई भाई अपने बहन के घर ज्वार कैसे ले जा सकता है। यह सोचकर वह एक गौशाला के पास रुका और ज्वार का थैला गाय के सामने पलट दिया। तभी गाय पालने वाले ने कहा कि आप गाय के सामने हीरे-मोती तथा सोना क्यों डाल रहे हो। भाई ने सारी बात उसे बताई और धन लेकर खुशी से अपनी बहन के घर की ओर चल दिया। दोनों बहन-भाई एक-दूसरे को देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
कथा का भाव यह है कि तुलसी माता की निष्काम सेवा करने वाली ननद के घर तक, उसके भाई के हाथ भेजा गया ज्वार भी धन बन गया, जबकि दिखावे और स्वार्थ से की गई सेवा फलदायी नहीं हुई।
तुलसी विवाह की पूजन विधि
कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी या द्वादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है, सामान्यतः संध्या (गोधूलि) के समय। तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है। मान्यता है कि तुलसी की नियमित पूजा से सुख-समृद्धि आती है और विधिपूर्वक तुलसी विवाह करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। प्रायः घर के कोई दम्पती तुलसी के माता-पिता बनकर कन्यादान करते हैं।
सामग्री: तुलसी का गमला; शालिग्राम (अथवा भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र); मंडप के लिए ईख (गन्ने) के चार-पाँच डंठल; गेरु; लाल चुनरी और साड़ी या वस्त्र; चूड़ियाँ, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी आदि सुहाग की सामग्री; रोली, चंदन, अक्षत; फूल और माला; धूप-दीप; जल से भरा कलश; नारियल और दक्षिणा; ऋतु के फल (जैसे सिंघाड़ा, शकरकंद, आँवला, बेर); मिठाई या पंचामृत का भोग।
संकल्प: पूजा आरम्भ करने से पहले दाहिने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर सरल शब्दों में अपना नाम, गोत्र और तिथि बोलें और संकल्प करें कि आप श्रद्धापूर्वक भगवान शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह सम्पन्न कर रहे हैं; फिर जल भूमि पर छोड़ दें। कुल-पुरोहित हों तो वे शास्त्रीय संकल्प करा सकते हैं।
तुलसी विवाह के लिए तुलसी के पौधे के गमले को गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख (गन्ने) का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग की प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं। गमले को साड़ी में लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर उनका शृंगार करते हैं। श्री गणेश सहित सभी देवी-देवताओं का तथा श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। पूजन करते समय तुलसी के लिए “ॐ तुलस्यै नमः” और शालिग्राम के लिए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें। इसके बाद एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें। भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। आरती के पश्चात् विवाहोत्सव पूर्ण किया जाता है।
जैसे विवाह में जो सभी रीति-रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह के सभी कार्य किए जाते हैं। विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं।
व्रत के नियम
- जो देवउठनी एकादशी का व्रत रखते हैं, वे एकादशी को निराहार या फलाहार रहते हैं और अन्न, विशेषकर चावल, नहीं लेते।
- तुलसी विवाह करने वाले दम्पती प्रायः विवाह सम्पन्न होने तक उपवास रखते हैं।
- एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि रहते, भगवान विष्णु की पूजा करके किया जाता है।
- तुलसी विवाह के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते; पूजा के लिए पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — तुलसी विवाह व्रत कथा, पृष्ठ 165–167
कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में वृंदा-प्रसंग की छूटी हुई मुख्य घटना जोड़ी गई और तिथि, स्रोत तथा फल-कथन सुधारे गए; तिथि, कथा का भाव और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।