वामन जयंती व्रत कथा
वामन जयंती भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मनाई जाती है, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था। नीचे वामन जयंती व्रतोपवास की कथा, पूजन विधि और व्रत के नियम दिए गए हैं।
तिथि: भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (दोनों पंचांगों में समान)। द्वादशी के साथ श्रवण नक्षत्र का योग विशेष शुभ माना जाता है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।
वामन जयंती व्रतोपवास कथा
कथा-स्रोत: पौराणिक — श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कन्ध
पुराणों में लिखा है कि देव माता अदिति ने विष्णु जी की तपस्या की (श्रीमद्भागवत के अनुसार कश्यप जी के कहने पर पयोव्रत करके)। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि वे अदिति के पुत्र के रूप में जन्म लेकर देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति प्रदान करेंगे। इसी वरदान को पूरा करने के लिए भगवान अदिति के घर भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन वामन रूप में जन्म लिया।
जन्म के कुछ ही समय में भगवान बालक से युवा हो गए। (श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि जन्म के बाद भगवान ने वामन — बौने — ब्रह्मचारी बटुक का रूप धारण किया और उनका उपनयन संस्कार हुआ।) इस समय राजा बलि यज्ञ कर रहे थे। भगवान वामन यज्ञ स्थल पर पहुंचकर राजा बलि से बोले कि उन्हें दान स्वरूप तीन पग भूमि चाहिए। राजा बलि ने भगवान की मांग को स्वीकार करते हुए उनसे कहा कि आप जहां चाहें वहां तीन पग भूमि ले लें। बलि के इतना कहने पर भगवान ने विराट रूप धारण किया और पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग (ऊर्ध्व लोक) नाप लिए। इसके बाद तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर भगवान ने उन्हें सुतल लोक (पाताल) भेज दिया और देवताओं को भय से मुक्ति दिलायी। बलि ने गुरु शुक्राचार्य के रोकने पर भी अपना वचन निभाया था; भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें सुतल लोक का राज्य दिया और स्वयं उनके द्वारपाल बने।
बलि के पाताल जाने के बाद ऋषि मुनियों एवं देवताओं ने भगवान की पूजा एवं स्तुति की। परम्परागत रूप से उस दिन से ही वामन की पूजा चली आ रही है। इस दिन श्रद्धालु भक्त स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं इसके बाद वामन भगवान की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अगर इस दिन श्रवण नक्षत्र हो तो इस व्रत की महत्ता और भी बढ़ जाती है। भक्तों को इस दिन उपवास करके वामन भगवान की स्वर्ण प्रतिमा (या सामर्थ्य के अनुसार मिट्टी की प्रतिमा अथवा चित्र) रखकर पंचोपचार सहित उनकी पूजा करनी चाहिए।
मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक वामन भगवान की पूजा करते हैं, वामन भगवान उनको सभी कष्टों से उसी प्रकार मुक्ति दिलाते हैं जैसे उन्होंने देवताओं को भय से मुक्त किया था।
व्रत के नियम
- व्रत द्वादशी के दिन रखा जाता है; अपनी सामर्थ्य के अनुसार फलाहार या एक समय सात्त्विक भोजन लिया जाता है और अन्न से परहेज़ किया जाता है।
- पूजा में वामन भगवान को चावल, दही और मिश्री का भोग लगाने और इन्हीं का दान करने की परम्परा है।
- संध्या को कथा सुनकर प्रसाद से व्रत खोला जाता है।
क्षेत्रीय परम्पराएँ
- केरल में ओणम राजा बलि (महाबली) के अपनी प्रजा से मिलने आने के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, और कई क्षेत्रों में दीपावली के बाद की बलि प्रतिपदा भी उन्हीं की स्मृति में है।
- इस्कॉन आदि वैष्णव पंचांगों में वामन द्वादशी का दिन कभी-कभी अलग पड़ता है।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — वामन जयंती व्रतोपवास, पृष्ठ 305–306
कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में नक्षत्र का नाम, व्याकरण और बलि-प्रसंग के तथ्य सुधारे गए तथा श्रीमद्भागवत के पाठ से टिप्पणियाँ जोड़ी गईं; तिथि, व्रत के नियम और क्षेत्रीय परम्पराएँ वेद पथ द्वारा लिखी गई हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।