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गणेश चतुर्थी व्रत कथा

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गणेश चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित पर्व है, जो हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। नीचे इस पर्व का परिचय, पारम्परिक व्रत कथा, स्यमंतक मणि का प्रसंग, पूजा-विधि और व्रत के नियम दिए गए हैं।

तिथि: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (दोनों पंचांगों में समान)। पूजा उस दिन होती है जिस दिन मध्याह्न में चतुर्थी तिथि हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

गणेश चतुर्थी

हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। मान्यता है (गणेश पुराण आदि के अनुसार) कि इसी दिन समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करनेवाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश का आविर्भाव हुआ था। (महाराष्ट्र आदि में माघ शुक्ल चतुर्थी को भी गणेश जयंती मनाई जाती है।) यह महापर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गुजरात आदि में तथा देश-विदेश में अनेक स्थानों पर हर्षोल्लासपूर्वक और भव्य तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से 1893 से यह सार्वजनिक गणेशोत्सव के रूप में, मंडप सजाकर अनंत चतुर्दशी तक, सामूहिक रूप से मनाया जाने लगा; दक्षिण भारत में, विशेषकर तमिलनाडु और केरल में, इस दिन चावल के आटे से बने कोळुकट्टै (मोदक) का भोग लगाने की परम्परा है। इस महापर्व पर लोग प्रातःकाल उठकर सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं। इस दिन चंद्र-दर्शन वर्जित माना जाता है (मिथ्या कलंक की मान्यता)। जिन परिवारों में पूजन के पश्चात् चंद्रमा को अर्घ्य देने की परम्परा है, वे नीची नज़र रखकर, चंद्रमा को सीधे देखे बिना अर्घ्य देते हैं और फिर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं। परम्परा है कि गणपति को 21 लड्डुओं (मोदकों) का भोग लगाया जाता है।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की व्रत-कथा पुस्तिकाओं में प्रचलित रूप; पुराणों का प्रसंग नीचे पाठांतर में)

एक बार भगवान् श्री शंकर स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगावती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद माता पार्वती ने स्नान करते समय अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया तथा उसमें प्राण डाल दिए। उसका नाम उन्होंने गणेश रखा।

फिर पार्वती जी ने गणेश जी से एक मुद्गर लेकर दरवाजे पर जाकर तब तक पहरा देने के लिए कहा जब तक वह स्नान न कर लें।

कुछ समय बाद भगवान् श्री शंकर स्नान करके वापिस आए और घर के भीतर प्रवेश करना चाहा तो गणेश जी ने उन्हें दरवाजे पर ही रोक दिया। इस पर भगवान् श्री शंकर बहुत क्रोधित हो उठे और उन्होंने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया और भीतर चले गए।

माता पार्वती ने जब भगवान् श्री शंकर को क्रोधित अंदर आते हुए देखा तो उन्हें लगा कि भोजन में विलम्ब होने के कारण शिव जी नाराज़ हैं। इसलिए उन्होंने तुरन्त ही भोजन परोस कर भगवान् शंकर को खाने के लिए बुलाया।

दो थालियों में भोजन लगा देखकर भगवान् श्री शंकर ने माता पार्वती जी से पूछा — “दूसरी थाली किसके लिए है?” इस पर माता पार्वती ने कहा — “यह हमारे पुत्र गणेश के लिए है, जो बाहर दरवाजे पर पहरा दे रहा है।”

यह सुनकर शिवजी आश्चर्यचकित हुए — “तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है?” पार्वती जी बोलीं — “हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं?” शिवजी ने कहा — “देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया।” यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं। वे विलाप करने लगीं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीति पूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया।

यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी। इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।

पाठांतर: यह कथा का लोक-प्रचलित रूप है। शिव पुराण (रुद्र संहिता, कुमार खण्ड) में शिवगणों से युद्ध के बाद शिवजी बालक का सिर काटते हैं और गण उत्तर दिशा में मिले हाथी का सिर लाते हैं; ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि की दृष्टि पड़ने से सिर कटने का प्रसंग है।

चंद्र-दर्शन और स्यमंतक मणि की कथा

कथा-स्रोत: पौराणिक — श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध (स्यमंतक प्रसंग); इसका चंद्र-दर्शन से सम्बन्ध लोक-परम्परा है।

लोक-मान्यता है कि गणेश जी ने अपना उपहास करने वाले चंद्रमा को शाप दिया था कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो उसे देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी तिथि को चंद्रमा देख लिया था और उन पर स्यमंतक मणि की चोरी का मिथ्या आरोप लगा।

भागवत के अनुसार सत्राजित को सूर्यदेव से स्यमंतक मणि मिली थी। उसका भाई प्रसेन वह मणि पहनकर शिकार को गया, जहाँ एक सिंह ने उसे मार डाला, और जाम्बवान ने सिंह को मारकर मणि ले ली। द्वारका में लोग कहने लगे कि मणि के लोभ में श्रीकृष्ण ने प्रसेन को मारा है। कलंक मिटाने के लिए श्रीकृष्ण वन में खोजते हुए जाम्बवान की गुफा तक पहुँचे। अट्ठाईस दिन के युद्ध के बाद जाम्बवान ने उन्हें अपने आराध्य श्रीराम के रूप में पहचाना और मणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह उनसे कर दिया। श्रीकृष्ण ने मणि सत्राजित को लौटा दी, जिसने लज्जित होकर अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह उनसे किया।

परम्परा है कि भूल से इस दिन चंद्र-दर्शन हो जाए तो यह कथा सुनी या पढ़ी जाती है।

पूजा-विधि

  • प्रातः स्नान करके व्रत और पूजा का संकल्प लें।
  • मध्याह्न में चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मिट्टी या धातु की गणेश प्रतिमा स्थापित करें।
  • षोडशोपचार या पंचोपचार से पूजन करें: दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, शमी-पत्र और मोदक या लड्डू अर्पित करें।
  • गणेश जी के नाम का जप, कथा-पाठ और आरती करें। विस्तृत विधि के लिए वेद पथ पर “गणपति-गौरी पूजा विधि” देखें।
  • प्रतिमा परिवार की परम्परा के अनुसार डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन रखी जाती है; दस दिन वाली स्थापना का विसर्जन अनंत चतुर्दशी को होता है।

व्रत के नियम

  • व्रत रखने वाले दिन भर फलाहार करते हैं या एक समय सात्त्विक भोजन लेते हैं; अन्न-त्याग परिवार की परम्परा पर निर्भर है।
  • इस दिन चंद्रमा को सीधे देखने से बचें।
  • पूजा और कथा के बाद मोदक का प्रसाद बाँटकर और ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — गणेश चतुर्थी व्रत कथा, पृष्ठ 259–260

    कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में चंद्र-दर्शन का नियम, संवाद-चिह्न और पाठांतर जोड़े गए; तिथि, स्यमंतक मणि का प्रसंग, पूजा-विधि और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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