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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

सकट चौथ (तिल चौथ) व्रत कथा

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सकट चौथ (तिल चौथ) का व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है और गणेश जी को समर्पित है; इसे माघ की संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। नीचे इस व्रत की पूजा-विधि, नियम और इससे जुड़ी दो पारम्परिक लोक-कथाएँ दी गई हैं।

तिथि: माघ कृष्ण चतुर्थी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में पौष कृष्ण चतुर्थी)। व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि हो। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

पूजा-विधि

  • यह व्रत मुख्यतः माताएँ संतान की मंगलकामना के लिए रखती हैं। मान्यता है कि इससे संकट दूर होते हैं।
  • तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूटकर तिलकुट बनाया जाता है; यही इस दिन का मुख्य भोग है।
  • संध्या को संकटहरण गणेश जी का पूजन करें: दूर्वा, रोली, तिलकुट और फल अर्पित करें, फिर कथा कहें या सुनें।
  • चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को जल का अर्घ्य दें; कई परिवार जल में दूध और तिल मिलाते हैं।
  • कुछ क्षेत्रों में तिलकुट का एक प्रतीकात्मक बकरा बनाया जाता है, जिसे घर का कोई बच्चा काटता है और सबको प्रसाद बाँटा जाता है। यह तिलकुट से बना प्रतीक है।

व्रत के नियम

  • परिवार की परम्परा के अनुसार दिन भर निर्जल या फलाहारी व्रत रखा जाता है।
  • चंद्रमा को अर्घ्य देकर, गणेश-पूजन और कथा के बाद व्रत खोला जाता है। कई परिवारों में चढ़ाए गए पकवान अगले दिन प्रातः प्रसाद रूप में ग्रहण किए जाते हैं।
  • बादलों के कारण चंद्रमा न दिखे तो स्थानीय पंचांग के चंद्रोदय-समय पर चंद्रमा की दिशा में अर्घ्य देने की रीति है।

कथा 1 — साहूकारनी और तिलकुटा (तिल चौथ कथा)

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (राजस्थान व उत्तर भारत की लोक-कथा)

सकट चौथ का व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है। इस दिन गणेश जी और चाँद की पूजा की जाती है। कहीं-कहीं इसे तिल चौथ भी कहा जाता है।

एक साहूकार दम्पती थे, जिनके कोई संतान नहीं थी। एक दिन साहूकार की पत्नी अग्नि लेने पड़ोस के घर में गई। वहाँ उसने देखा कि पड़ोसन एवं अन्य महिलाएँ पूजन कर कथा सुन रही हैं। यह देख उसने पूछा — आप सब किसकी पूजा एवं व्रत कर रही हो तथा इस व्रत के करने से क्या फल मिलता है? पड़ोसन ने साहूकार की पत्नी को बताया कि यह चतुर्थी की पूजा है। इस दिन व्रत करने तथा कथा कहने-सुनने से बिछड़े हुए मिल जाते हैं। सुख-समृद्धि एवं संतान की मनोकामना पूरी होती है। यह सुनकर साहूकारनी ने वहीं संकल्प किया कि यदि मेरे कोई संतान हो जाएगी तो मैं भी सवा सेर (सेर — पुराना तौल, लगभग 0.9 किलो) का तिलकुटा चढ़ाऊँगी।

सकट चौथ माता ने उसकी मनोकामना पूरी की तथा उसे पुत्ररत्न हुआ, पर वह तिलकुटा चढ़ाना भूल गई। इसके बाद उसके छह बेटे और हुए, फिर भी उसे तिलकुटा चढ़ाने की याद नहीं आई। सातों बेटे बड़े होने लगे। उसने बड़े बेटे के विवाह के लिए फिर से मन्नत माँगते हुए कहा — यदि मेरे बेटे का विवाह हो जाए तो सवा मन (मन — चालीस सेर, लगभग 37 किलो) का तिलकुटा चढ़ाऊँगी। विवाह की सभी तैयारियाँ होने लगीं, फिर भी साहूकारनी तिलकुटा चढ़ाना भूल गई।

जब उसका बेटा फेरों में बैठ गया तो चौथ माता और विनायक जी ने सोचा कि साहूकारनी हर बार तिलकुटा बोल तो देती है लेकिन चढ़ाती एक बार भी नहीं। अब तो इसके बेटे का विवाह भी सम्पन्न होने जा रहा है। अगर हम इसे चमत्कार नहीं दिखाएँगे तो हमें कौन मानेगा। इतना कह चौथ माता ने दूल्हे को फेरों से उठाकर गाँव के बाहर पीपल के पेड़ पर बैठा दिया। दूल्हे के अचानक इस तरह फेरों पर से गायब हो जाने से वहाँ विवाह में शामिल लोगों में हाहाकार मच गया। सभी तरफ दूल्हे को खोजा गया, पर वह कहीं नहीं मिला और दिन बीतते गए।

जब गणगौर पूजन के लिए गाँव के बाहर लड़कियाँ दूब लेने जातीं तो वह लड़की भी उनके साथ जाती जिसका पति फेरों से गायब हो गया था। सब सहेलियाँ जब राह में एक पीपल के समीप से गुजरतीं तो पीपल पर बैठा उसका दूल्हा उसे देखकर कहता — आए म्हारी अद ब्याही हुई (अर्थात — आ गई मेरी आधी ब्याही हुई, जिसका विवाह अधूरा रह गया)। यह आवाज सुनकर वह लड़की चिन्तित होती। इसी चिन्ता से वह दुबली होती जा रही थी। तब माँ ने दुबली होने का कारण पूछा तो बेटी ने बताया कि — मैं जब भी गणगौर पूजने के लिए दूब लेने जाती हूँ तो पीपल में से एक आदमी बोलता है — आए म्हारी अद ब्याही हुई। उसने दूल्हे के कपड़े पहन रखे हैं, हाथों में मेहंदी लगा रखी है और कंगना बाँध रखा है, सिर पर सेहरा बाँध रखा है, आँखों में काजल लगा रखा है।

बेटी की बात सुनकर माँ उस पेड़ को देखने आई। माँ ने देखा वह तो उसी का दामाद है जो फेरों पर से अचानक गायब हो गया था। उसने अपने दामाद से वहाँ बैठने का कारण पूछा तो दूल्हे ने बताया — मैं चौथ माता के यहाँ गिरवी हूँ। मेरी माँ ने तिलकुटा बोला था और चढ़ाया नहीं। इस कारण चौथ माता नाराज हैं और उन्होंने मुझे यहाँ बैठा रखा है। दामाद की बात सुनकर सास उसी समय उसकी माँ के पास गई और सारी बातें बताईं। साहूकारनी ने उसी दिन ढाई मन का तिलकुटा चढ़ाकर चौथ माता के भोग लगाया और पूजा की। इससे चौथ माता खुश हुईं। उसने गिरवी रखे बेटे को छोड़ दिया और विवाह सम्पन्न हुआ। इसके बाद साहूकारनी हर चौथ का व्रत करने लगी।

कथा 2 — कुम्हार का आँवा (सकट माता की कथा)

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा)

किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन बनाकर आँवा लगाया तो आँवा पका ही नहीं। हारकर वह राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगा। राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा तो राजपंडित ने कहा कि हर बार आँवा लगाते समय बच्चे की बलि देने से आँवा पक जाएगा। राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह परिवार अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता।

इसी तरह कुछ दिनों बाद सकट के दिन एक बुढ़िया के लड़के की बारी आई। बुढ़िया के लिए वही जीवन का सहारा था। राजाज्ञा कुछ नहीं देखती। दुःखी बुढ़िया सोच रही थी कि मेरा तो एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझसे जुदा हो जाएगा। बुढ़िया ने लड़के को सकट की सुपारी और दूब का बीड़ा देकर कहा — “भगवान का नाम लेकर आँवा में बैठ जाना, सकट माता रक्षा करेंगी।” बालक आँवा में बिठा दिया गया और बुढ़िया सकट माता के सामने बैठकर पूजा करने लगी।

पहले तो आँवा पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आँवा पक गया था। सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया — आँवा पक गया था। इस बार आँवे में बैठाए गए बुढ़िया के बेटे सहित सभी बालक जीवित एवं सुरक्षित थे। नगरवासियों ने सकट की महिमा स्वीकार की तथा लड़के को भी धन्य माना। सकट माता की कृपा से पहले बलि दिए गए नगर के बालक भी जी उठे।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — सकट चौथ (तिल चौथ) व्रत कथा, पृष्ठ 2–5

    दोनों कथाएँ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारी गईं और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गईं। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में पुस्तिका से बाहर का, वेब से आया एक अंश हटाया गया और व्याकरण सुधारा गया; तिथि, पूजा-विधि, व्रत के नियम और शब्दार्थ वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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