गणेश मंत्र
आकार
प्रदर्शन
ॐ गं गणपतये नमः
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः
शब्दार्थ
ॐ परम पवित्र ध्वनि
गं गणेश बीज मंत्र
गणपतये गणों के स्वामी को
नमः नमन, प्रणाम
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
शब्दार्थ
वक्रतुण्ड टेढ़ी सूँड वाले
महाकाय विशाल शरीर वाले
सूर्यकोटि करोड़ों सूर्य
समप्रभ के समान प्रकाशवान
निर्विघ्नम् विघ्नरहित, बाधारहित
कुरु करो, कीजिए
मे मेरे
देव हे देव, हे भगवान
सर्वकार्येषु सभी कार्यों में
सर्वदा सदैव, हमेशा
अर्थ
गणेश मंत्र भगवान गणेश को समर्पित हैं, जो विघ्नहर्ता, बुद्धि और सिद्धि के देवता हैं। हिंदू परंपरा में किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है।
“ॐ गं गणपतये नमः” गणेश जी का बीज मंत्र है, जिसमें “गं” गणेश बीज है। “वक्रतुण्ड महाकाय” मंत्र गणेश जी के स्वरूप का वर्णन करते हुए विघ्नों के नाश की प्रार्थना है।
लाभ
- विघ्न निवारण: सभी बाधाओं और विघ्नों का नाश होता है
- बुद्धि वृद्धि: बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है
- शुभ आरंभ: नए कार्यों की शुभ शुरुआत होती है
- सिद्धि प्राप्ति: कार्यों में सफलता और सिद्धि प्राप्त होती है
- समृद्धि: धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है
- ज्ञान प्राप्ति: विद्या और ज्ञान में उन्नति होती है
जप विधि
- किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में इस मंत्र का जप करें
- बुधवार और गणेश चतुर्थी पर जप विशेष फलदायी है
- 108 बार या 21 बार जप करें
- लाल चंदन की माला से जप करना शुभ है
- मोदक या लड्डू का भोग लगाकर जप करना उत्तम है
- जप करते समय भगवान गणेश का ध्यान करें
जप गणक
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संदर्भ 3
- Ganapati Upanishad — Named as the basis of this entry in its seed file
- Mudgala Purana — Named as the basis of this entry in its seed file
- Ganapati Atharvashirsha — Named as the basis of this entry in its seed file
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।