पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
आकार
मांडणी
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो ।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो ।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो ।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो ।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो ।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो ।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो ।
स्रोत 1
- Sahaja Yoga "Sahaj Geet" pustika — Traditional deity bhajans only
संदर्भ 3
- kavitakosh.org — Kavitakosh, Mirabai: the full pad (refrain + 5 lines). The corrected line 'खरच न खूटै चोर न लूटै' is quoted from here.
Checked against this text when the bhajan was restored to its full form.
- kavitakosh.org — Kavitakosh, sung bhajan form: 'मैंने', 'मेरे सतगुरु', 'खर्चे ने खूटे चोर न लूटे', 'जस गायो'. Confirms the current Hindi-ised sung wording and the same line count.
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- kavitakosh.org — Kavitakosh, second Mira text: 'खायो न खरच चोर न लेवे … जश गायो'. Same 6 lines.
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