श्री गङ्गाधर आरती - जय गङ्गाधर जय हर
परिचय
यह आरती गीताप्रेसके नित्यकर्म-पूजाप्रकाशमें वैदिक शिव-पूजनके अन्तमें छपी है । इसमें कैलासपर शिव-पार्वतीकी लीला, मृदङ्ग और डमरूके बोल तथा शिवके स्वरूपका वर्णन है, और प्रत्येक पद्यके अन्तमें “हर हर हर महादेव” का टेक आता है ।
आरती-विधान
नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (पृष्ठ २३९) में आरती करनेका क्रम इस प्रकार दिया है —
आरतीका यह मुख्य विधान है कि सर्वप्रथम चरणोंमें चार बार, नाभिमें दो बार, मुखमें एक बार आरती करनेके बाद पुनः समस्त अङ्गोंकी सात बार आरती करनी चाहिये ।
आरतीके समय पढ़नेका मन्त्र —
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् ।
आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव ॥
स्रोत 1
- नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (गीताप्रेस, गोरखपुर) — पृष्ठ २७०–२७२
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