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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा

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कार्तिक मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा या त्रिपुरी पूर्णिमा कहा जाता है। शैव तथा वैष्णव दोनों परम्पराओं में इसका विशेष महत्व है। इसी दिन काशी में देव दीपावली मनाई जाती है, कार्तिक स्नान और भीष्म पंचक पूर्ण होते हैं, और पुष्कर का मेला भी इसी पर्व पर होता है। नीचे त्रिपुर-संहार की कथा, इसका माहात्म्य एवं स्नान-दान की विधि दी गई है।

तिथि: कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा (दोनों पंचांगों में समान)। स्नान-दान उस दिन होता है जिस दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा हो; दीपदान और चंद्र-पूजन उस संध्या को होते हैं जब चंद्रोदय के समय पूर्णिमा हो, इसलिए कुछ स्थानों पर ये दो अलग दिनों पर पड़ सकते हैं। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

त्रिपुर-संहार कथा

कथा-स्रोत: पौराणिक — शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध खण्ड) की त्रिपुर-वध कथा, वेद पथ द्वारा संक्षेप में।

तारकासुर के वध के बाद उसके तीन पुत्रों — तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली — ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। अमरता का वर न मिलने पर उन्होंने तीन नगर मांगे, जिन्हें मय दानव ने बनाया: स्वर्ग में सोने का, आकाश में चांदी का और पृथ्वी पर लोहे का। वर यह था कि ये तीनों पुर एक हजार वर्ष में एक बार एक सीध में आएंगे, और तभी कोई उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सकेगा।

समय के साथ तीनों भाई और उनकी प्रजा धर्म से विमुख होकर देवताओं और ऋषियों को सताने लगे। तब देवताओं ने भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की। शिव जी के लिए दिव्य रथ बना — पृथ्वी रथ बनी, सूर्य और चंद्रमा उसके पहिए बने, ब्रह्मा जी सारथी बने, मेरु पर्वत धनुष, वासुकि नाग प्रत्यंचा और भगवान विष्णु बाण बने। जैसे ही तीनों पुर एक सीध में आए, शिव जी ने एक ही बाण से उन्हें भस्म कर दिया और वे त्रिपुरारि कहलाए। परम्परा के अनुसार यह विजय कार्तिक पूर्णिमा को हुई; इसी आनंद में देवताओं ने दीप जलाए, जिसकी स्मृति में काशी में देव दीपावली मनाई जाती है।

कार्तिक पूर्णिमा माहात्म्य

कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुर (तारकासुर के पुत्रों के तीन नगरों) का संहार किया था और वे त्रिपुरारि के रूप में पूजित हुए थे। ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृत्तिका नक्षत्र में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनसूया और क्षमा — इन छह कृत्तिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है, ऐसा माना जाता है।

मान्यता यह भी है कि इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर रात्रि में वृषदान (बैल या बछड़े का दान) करने से शिवपद की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस दिन उपवास करके भगवान भोलेनाथ का भजन और गुणगान करता है उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस पूर्णिमा को शैव मत में जितनी मान्यता मिली है उतनी ही वैष्णव मत में भी।

वैष्णव परम्परा में भी कार्तिक पूर्णिमा का बड़ा महत्व है। एक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था (अनेक पंचांगों में मत्स्य जयंती चैत्र शुक्ल तृतीया को मानी जाती है)। यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। यदि रोहिणी नक्षत्र हो तो यह पूर्णिमा “महाकार्तिकी” कहलाती है और इसका महत्व कई गुना माना गया है। इस दिन कृत्तिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। कृत्तिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो “पद्मक योग” बनता है जिसमें गंगा स्नान का फल पुष्कर-स्नान से भी अधिक उत्तम माना गया है।

विधि-विधान

मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन और यज्ञ करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। अन्न, धन एवं वस्त्र दान का बहुत महत्व बताया गया है; मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक), सरोवरों तथा तीर्थों (कुरुक्षेत्र, अयोध्या, काशी, पुष्कर) में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। परम्परा में महर्षि अंगिरा के नाम से यह नियम कहा जाता है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय हाथ में जल लेकर दान करें। यज्ञ और जप करना हो तो पहले संख्या का संकल्प कर लें, फिर जप और यज्ञादि कर्म करें।

व्रत के नियम

  • व्रती प्रातः स्नान के बाद संकल्प लेकर दिन भर उपवास या फलाहार करते हैं; अन्न, नमक और तामसिक भोजन नहीं लिया जाता।
  • संध्या को भगवान शिव और भगवान विष्णु का पूजन करके घर, मंदिर, तुलसी और जलाशय के पास दीपदान करें।
  • चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलें; अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या दीप का दान करें।

कार्तिक पूर्णिमा को सिख धर्म के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व (गुरपुरब) मनाया जाता है। श्रद्धालु प्रातः स्नान कर गुरुद्वारों में जाकर गुरबाणी सुनते हैं और गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं पर चलने का संकल्प लेते हैं।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा, पृष्ठ 240–241

    माहात्म्य और विधि का पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में तथ्य, वर्तनी और वेब-लेख जैसी "आप" वाली भाषा सुधारी गई; तिथि, त्रिपुर-संहार कथा और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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