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भाखौरियौ सोमवार व्रत कथा

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भाखौरियौ सोमवार भगवान शिव का व्रत है, जो श्रावण मास के पहले सोमवार से आरम्भ होकर कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक, लगभग साढ़े तीन महीने, हर सोमवार को किया जाता है। “भाखौरियौ” इस व्रत का लोक-नाम है; पुस्तिका इसका अर्थ नहीं बताती। नीचे चारुदत्त नामक निर्धन ब्राह्मण की कथा, पूजा-विधि, व्रत के नियम और उद्यापन दिए गए हैं।

तिथि: श्रावण मास का पहला सोमवार (आरम्भ) से कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी (उद्यापन) तक हर सोमवार। पूर्णिमांत पंचांग में श्रावण मास अमांत पंचांग से लगभग पंद्रह दिन पहले आरम्भ होता है, इसलिए पहला सोमवार अपने पंचांग के अनुसार गिनें; कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी दोनों पंचांगों में समान है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

भाखौरियौ सोमवार व्रत कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (व्रत-पुस्तिका की लोक-कथा; किसी पुराण में इसका मूल नहीं मिला)

अम्बावती नगर में चारुदत्त नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह बहुत गरीब था, इसलिए भिक्षा मांग कर अपनी गुजर-बसर करता था। वह ब्राह्मण और उसकी पत्नी शिव भक्त थे और बहुत भक्ति भाव से रोज पूजा किया करते थे। आए दिन अतिथियों को आदर सहित भोजन कराया करते थे। दोनों पति-पत्नी सत्यवादी थे। उन दोनों की भक्ति देखकर भगवान शिव साधु का वेश धारण कर उनके घर पहुंचे। साधु को घर आए देखकर चारुदत्त बहुत खुश हुआ। उसने साधु की खूब आवभगत की और अपने बाँट का भोजन साधु को कराया। साधु ने भोजन करते हुए पूछा — हे भूदेव, आप दुःखी लगते हैं। क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूं? साधु की बात सुनकर चारुदत्त की आंखें भर आईं। उसने विनम्र भाव से कहा — महात्मा जी, मैं पंडित हूं, ज्ञानी हूं, परन्तु अन्नदाता मुझसे रुष्ट हैं। मैं भगवान शिव की भक्ति करता हूं फिर भी शिव कृपा मुझ पर नहीं होती। कृपा कर आप मुझे कोई उपाय बताएं जिससे मेरे कष्ट दूर हों तथा हम भूखे न रहें। चारुदत्त की बात सुनकर साधु ने धैर्य बंधाते हुए कहा — सुख-दुःख तो जीवन के दो पहलू हैं, ये दोनों हमेशा साथ-साथ चलते हैं, इसलिए तुम दुःखी मत हो। पूर्व जन्मों का फल तो भुगतना पड़ता है। यह कहकर साधु एक पल के लिए मौन हो गए। थोड़ी देर बाद साधु बोले — हे चारुदत्त, तुम भाखौरियौ सोमवार का व्रत करो। इससे तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप तो नष्ट होंगे ही, दुःख-गरीबी भी नष्ट होगी। इस व्रत से भगवान शंकर तुमसे खुश होंगे। साधु की बात सुनकर दम्पति बहुत खुश हुए और मन ही मन यह व्रत करने का निश्चय कर साधु को आदर सहित विदा किया। जब श्रावण मास का पहला सोमवार आया तो दम्पति ने यह व्रत करना शुरू किया। इस व्रत के कारण उन दोनों के सब कष्ट दूर हो गए तथा चारुदत्त को राजाश्रय मिला तथा वह राजपुरोहित हो गया। यह व्रत साढ़े तीन माह तक लगातार किया जाता है। कार्तिक सुदी (शुक्ल) चतुर्दशी को इसका उद्यापन होता है।

पूजा-विधि

  • सोमवार को प्रातः स्नान करके शिवलिंग या शिव-पार्वती के चित्र के सामने व्रत का संकल्प लें।
  • शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाएँ और चन्दन, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा व पुष्प अर्पित करें।
  • धूप-दीप जलाकर “ॐ नमः शिवाय” का जप करें और यह कथा पढ़ें या सुनें।
  • अन्त में शिवजी की आरती करें।

व्रत के नियम

  • श्रावण के पहले सोमवार से कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक हर सोमवार व्रत रखा जाता है; बीच में कोई सोमवार न छोड़ें।
  • सामान्य प्रथा में दिन में फलाहार किया जाता है और शाम की पूजा के बाद एक बार भोजन लिया जाता है। भोजन में नमक और अन्न के नियम परिवार की परम्परा के अनुसार होते हैं।

उद्यापन

पुस्तिका केवल यह बताती है कि उद्यापन कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को होता है। सामान्य प्रथा में उस दिन शिव-पार्वती का विधिवत पूजन किया जाता है, कथा सुनी जाती है, और ब्राह्मण या ज़रूरतमंदों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दी जाती है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — भाखौरियौ सोमवार व्रत कथा, पृष्ठ 206

    कथा पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्र (पृष्ठ 206) से उतारी गई और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गई। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में देवता का नाम स्पष्ट किया गया; तिथि, पूजा-विधि, व्रत के नियम और उद्यापन के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं। यह व्रत और कथा किसी पुराण में नहीं मिले; ये इसी पुस्तिका की लोक-परम्परा से हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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