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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

महाशिवरात्रि व्रत कथा

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महाशिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है और भगवान शिव को समर्पित है। नीचे भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को सुनाई गई महाशिवरात्रि की लोक-प्रचलित व्रत-कथा, पूजा-विधि और व्रत के नियम दिए गए हैं।

तिथि: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में माघ कृष्ण चतुर्दशी)। व्रत उस दिन रखा जाता है जिसकी रात में निशीथ काल (मध्यरात्रि) के समय चतुर्दशी हो। कश्मीरी पंडित यही पर्व “हेरथ” के रूप में एक दिन पहले, त्रयोदशी को मनाते हैं। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

महाशिवरात्रि की व्रत-कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत में प्रचलित कथा; इसका पौराणिक रूप शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 40 में है — कथा के अंत की टिप्पणी देखें)

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?

उत्तर में शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई— एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

रात्रि का पहला प्रहर बीतने को था, तब एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना। शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।

दूसरे प्रहर में एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, हे पारधी (शिकारी)! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का तीसरा प्रहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली, शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।

शिकारी हँसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। चौथा प्रहर बीतने पर जब पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देवलोक से समस्त देवगण भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

टिप्पणी: यह कथा का लोक-प्रचलित रूप है। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 40) में यही कथा गुरुद्रुह नामक भील की है — उसमें साहूकार और शिवमठ का प्रसंग नहीं है; वह भूखे परिवार के लिए शिकार करने निकलता है और रात के चारों प्रहरों में उसके हाथ से जल और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरते हैं। अंत में शिवजी उसे “गुह” नाम देकर वर देते हैं कि श्रृंगवेरपुर में उसके घर श्रीराम आएँगे, और मृग-परिवार दिव्य विमान से स्वर्ग जाता है।

पूजा-विधि

  • प्रातः स्नान करके शिवजी के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
  • संध्या के बाद रात्रि को चार प्रहरों में बाँटकर हर प्रहर में शिवलिंग की पूजा करें। प्रचलित परम्परा में चारों प्रहरों का अभिषेक क्रम से दूध, दही, घी और शहद से होता है, फिर शुद्ध जल से; क्रम क्षेत्र के अनुसार बदलता है।
  • हर प्रहर में बेलपत्र, चंदन, अक्षत, पुष्प और धूप-दीप अर्पित करें और “ॐ नमः शिवाय” का जप करें।
  • जो चारों प्रहर की पूजा न कर सकें, वे निशीथ काल (मध्यरात्रि) में एक बार पूजा करते हैं।
  • रात्रि जागरण में शिव-कथा, भजन या पाठ किया जाता है।

व्रत के नियम

  • व्रत सामर्थ्य के अनुसार निर्जल, केवल जल लेकर या फलाहार पर रखा जाता है; अन्न नहीं लिया जाता।
  • दिन भर संयम, सात्त्विक आचरण और शिव-स्मरण रखा जाता है।
  • पारण: अगले दिन प्रातः स्नान-पूजा के बाद व्रत खोला जाता है; परम्परा है कि जहाँ सम्भव हो, पारण चतुर्दशी समाप्त होने से पहले कर लिया जाए।

स्रोत 2

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — महाशिवरात्रि व्रत कथा, पृष्ठ 187–189

    कथा-पाठ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में कथा का अंत स्कैन से मिलाया गया और शिव पुराण के पौराणिक रूप की टिप्पणी जोड़ी गई; तिथि, पूजा-विधि और व्रत के नियम वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

  • शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता (संस्कृत विकिस्रोत) — अध्याय 40 — शिवरात्रि-व्रत माहात्म्य (गुरुद्रुह भील की कथा)

    कथा के अंत की टिप्पणी में दिया गया पौराणिक रूप — गुरुद्रुह, चार प्रहर, "गुह" नाम, श्रृंगवेरपुर में श्रीराम का आगमन — इसी अध्याय से मिलाया गया।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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