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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

रविवार प्रदोष व्रत कथा

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तिथि: रविवार को पड़ने वाली त्रयोदशी (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)। व्रत उस दिन होता है जिस दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का संध्या-समय) में त्रयोदशी हो, और वह दिन जिस वार को पड़े उसी वार का प्रदोष माना जाता है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

पूर्वकाल में एक बार संसार के जीवों की भलाई के लिए विचार-विमर्श हेतु पतित पावनी गंगा के तट पर ऋषियों का विशाल समागम हुआ जिसमें शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषि सम्मिलित थे। उस समागम स्थल पर वेद-पुराणों के ज्ञाता व वेदव्यासजी के परम शिष्य सूतजी भी पधारे। उस समय ऋषियों ने पाद्य-आसन अर्पण करके उनका भव्य स्वागत किया।

जब सूतजी ने आसन ग्रहण कर लिया तब ऋषियों में प्रमुख शौनक मुनि ने ऋषि समुदाय की ओर से सूतजी से पूछा कि हे ज्ञानवान मुनि! आप हमें यह बताएँ कि कलिकाल में भगवान शिव की भक्ति सरलतापूर्वक कैसे प्राप्त होगी? कलिकाल में मनुष्य पापकर्मों में लिप्त होकर वेद-शास्त्र के ज्ञान से विमुख हो जाएँगे, सद्कर्मों को कोई करना नहीं चाहेगा, पुण्य क्षीण हो जाएँगे और वह अनेक कष्टों से घिर जाएँगे, अतः हे मुने! आप कोई ऐसा उत्तम व्रत बताएँ जिसको करने से कलिकाल के पाप दूर होकर, मनुष्यों को मनवांछित फल की प्राप्ति होकर वे सुखी हो जाएँ।

शौनक मुनि के भावपूर्ण व जनहित के प्रश्न का उत्तर देते हुए सूतजी बोले कि हे ऋषियो! आप धन्य हैं, क्योंकि आप सदैव जनहित का ही विचार करते रहते हैं। आपका यह प्रश्न अत्युत्तम है। अब मैं आपको वह व्रत बतलाता हूँ जिसको करने से मनुष्यों को आयु, स्वास्थ्य, धन, सुख-समृद्धि, संतति के साथ-साथ मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत पूर्वकाल में भगवान शिव ने माता पार्वती के पूछने पर उन्हें बताया था। इसकी विधि भी सुनो।

व्रत विधि

सूतजी बोले कि हे ऋषियो! मान्यता है कि इस व्रत से आयु-वृद्धि और स्वास्थ्य का विशेष लाभ होता है। रविवारीय प्रदोष व्रत करने वालों को चाहिए कि वे प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि दैनिक कर्मों को करके, निराहार रहकर मन-ही-मन भगवान शिव का ध्यान करें। फिर शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव का पूजन करके त्रिपुण्ड्र का तिलक ललाट पर लगाएँ और भक्तिभाव से बिल्वपत्र, धूप-दीप, ऋतुफल अर्पण करके ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का रुद्राक्ष की माला पर यथाशक्ति जाप करें। तत्पश्चात् ब्राह्मण को भोजन व दक्षिणा से संतुष्ट करके आशीर्वाद लें और मौन धारण करें।

यदि सामर्थ्य हो तो हवन भी करें और शिव-मंत्र से आहुतियाँ दें (मंत्र और हवन-विधि किसी योग्य ब्राह्मण से लें)। मान्यता है कि ऐसा करने से मनवांछित फल मिलते हैं। व्रतकर्ताओं को चाहिए कि भोजन एक बार करें और पृथ्वी पर शयन करें। परम्परा में इस व्रत को श्रावण मास में करने का विशेष महत्व माना जाता है।

हे ऋषियो! यह व्रत भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया था और उनसे मेरे गुरु वेदव्यासजी ने सुना, फिर उन्होंने मुझे बताया। वही व्रत मैंने आप लोगों को बतला दिया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं।

सूतजी के ऐसा कहने पर शौनक मुनि ने पूछा कि हे मुनिश्रेष्ठ! आपने सर्वसुखदायक, मंगलकारी, अतिगुप्त यह व्रत बतलाया। अब आप यह बतलाएँ कि यह व्रत पहले किसने किया था और उसे क्या फल प्राप्ति हुई? इस पर सूतजी ने कहा कि अब आप लोग यह कथा श्रवण करें—

कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (व्रत-पुस्तिकाओं में सूत–शौनक संवाद के ढाँचे में प्रचलित कथा; किसी पुराण में इसका स्थान चिह्नित नहीं है)

किसी गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी धार्मिक प्रवृत्ति की थी और वह प्रदोष व्रत किया करती थी। उनके एक पुत्र था। एक बार उनका वह पुत्र गंगा स्नान करने के लिए गया तब मार्ग में उसे चोरों ने चारों ओर से घेर लिया और डरा-धमकाकर उससे पूछने लगे कि बता, तेरे पिता ने अपना धन कहाँ छिपाकर रखा है? इस पर ब्राह्मणपुत्र ने दीन भाव से कहा कि मेरे पिताजी तो बहुत ही दीन-हीन हैं। उनके पास भला धन कहाँ है।

एक चोर उससे उसकी पोटली छीनकर देखने लगा तो उसमें रूखी-सूखी रोटियाँ थीं। यह देखकर दूसरा चोर बोला कि यह तो वास्तव में ही गरीब लगता है, इसे जाने दो। दूसरे चोर ने जब ऐसा कहा तो वह ब्राह्मणपुत्र अपने मार्ग पर आगे बढ़ गया। चलते-चलते वह एक नगर से कुछ दूर पहले ही बरगद के एक पेड़ के नीचे बैठ गया, क्योंकि वह काफी थका-माँदा था। इसलिए बैठे-बैठे ही उसे नींद आ गई।

उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उस ओर निकल आए। उन्होंने ब्राह्मणपुत्र को पेड़ के नीचे सोते हुए देखा तो चोर समझकर उसे बंदी बना लिया और राजा के समक्ष ले गए। राजा ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी और बंदीगृह में डलवा दिया।

उधर उस ब्राह्मणपुत्र की माँ प्रदोष व्रत कर रही थी। उसके व्रत के प्रभाव से भगवान शिव ने उस राजा को स्वप्न में आदेश दिया कि हे राजन्! यह ब्राह्मणपुत्र निर्दोष है, प्रातः होते ही इसे छोड़ दो। यदि तुमने इसे नहीं छोड़ा तो तुम्हारा राज्य व वैभव सबकुछ नष्ट हो जाएगा।

राजा ने सुबह जागते ही उस ब्राह्मणपुत्र को तुरंत बुलवाया और पूछा तो उसने सबकुछ सच-सच बतला दिया। फिर राजा ने उसके माता-पिता को बुलवाया तो वे भयभीत-से दरबार में उपस्थित हुए। उन्हें भयभीत देखकर राजा ने कहा कि तुम्हारा यह बालक निर्दोष व निडर है। तुम्हारी दरिद्रता को देखते हुए मैं तुम्हें पाँच गाँव दान में देता हूँ।

कथा के अनुसार, इस प्रकार प्रदोष व्रत के प्रभाव व शिव कृपा से वह ब्राह्मण दरिद्र से धनवान बन गया और सुख से जीवन यापन करने लगा।

आरती

पूजन के अंत में श्री शिव आरती — ॐ जय शिव ओंकारा का गायन करें।

व्रत की सम्पूर्ण विधि, माहात्म्य एवं उद्यापन विधि के लिए देखें — प्रदोष व्रत कथा एवं पूजन विधि।

स्रोत 1

  • प्रदोष व्रत कथा — पवन पॉकेट बुक्स, दिल्ली (मुद्रित पुस्तिका) — प्रदोष व्रत कथा (पूजन विधि, सातों वारों की प्रदोष कथाएँ, माहात्म्य, उद्यापन विधि व आरती सहित), पवन पॉकेट बुक्स, 4537 नई सड़क, दिल्ली-110006; पृष्ठ 2–23

    पाठ मुद्रित पुस्तिका के पृष्ठ-चित्रों से मिलाकर उतारा गया है — दिया गया लिंक प्रकाशक का सूची-पृष्ठ है, पाठ का स्रोत नहीं। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में फल-सम्बन्धी कथन मान्यता के रूप में रखे गए और हवन का असत्यापित मंत्र सामान्य निर्देश से बदला गया; तिथि और कथा-स्रोत की पंक्तियाँ वेद पथ द्वारा लिखी गई हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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