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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

सावन सोमवार व्रत कथा

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सावन (श्रावण) मास के प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखा जाता है और इसे अत्यन्त फलदायी माना गया है। नीचे इस व्रत की पूजन विधि, पूजा सामग्री, व्रत के नियम और सावन मास के महत्व की कथा दी गई है।

तिथि: श्रावण मास के सभी सोमवार। पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) में सावन आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से और अमांत पंचांग (महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत) में आषाढ़ अमावस्या के अगले दिन से आरम्भ होता है, इसलिए दोनों पंचांगों के सावन सोमवार लगभग पंद्रह दिन के अन्तर पर पड़ते हैं। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

पूजन विधि

श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को शिवजी के व्रत किये जाते हैं। श्रावण मास में शिवजी के व्रत एवं पूजा का विशेष महत्व है। शिवजी के ये व्रत बहुत फलदायी माने जाते हैं। माना जाता है कि इन व्रतों को करने वाले भक्तों से शिवजी बहुत प्रसन्न होते हैं। ये व्रत शिवजी को प्रसन्न करने के लिये किए जाते हैं।

इन व्रतों में शिवजी का पूजन करके एक समय भोजन किया जाता है। इस व्रत में भगवान् शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि इससे भगवान् शिव प्रसन्न होकर मनोवांछित फल देते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को गणेशजी, शिवजी, पार्वती जी और नन्दी की पूजा करने का विधान है।

शिवजी की पूजा में जल, दूध, दही, चीनी, घी, शहद, पंचामृत, कलावा, वस्त्र, चंदन, रोली, चावल, फूल, विजया, आक, बेलपत्र, धतूरा, कमलगट्टा, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, पंचमेवा, धूप, दीप, दक्षिणा सहित पूजा होती है। साथ ही कपूर से आरती करके भजन-कीर्तन और जागरण करना चाहिए। पूजन के पश्चात् कथा सुननी चाहिए और सम्भव हो तो किसी ब्राह्मण से रुद्राभिषेक करवाना चाहिए। मान्यता है कि इससे भगवान् शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और सोमवार का व्रत पुत्र, धन, विद्या आदि मनोवांछित फल देता है।

इस दिन सोलह सोमवार व्रत कथा का माहात्म्य सुनना चाहिए।

सावन मास का महत्व

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (श्रावण मास के महत्व से जुड़ी प्रचलित मान्यता)

शिव और सावन के सम्बन्ध के बारे में यह मान्यता प्रचलित है। दक्ष के यज्ञ में देह त्यागने से पहले सती ने संकल्प लिया था कि हर जन्म में वे शिव को ही पति रूप में पाएँगी। अगले जन्म में वे हिमवान और मैना की पुत्री पार्वती हुईं। उन्होंने सावन के महीने में निराहार रहकर कठोर तप किया, शिव प्रसन्न हुए और दोनों का विवाह हुआ। तभी से यह महीना शिव को विशेष प्रिय माना जाता है, और अविवाहित कन्याएँ योग्य वर की कामना से सावन सोमवार का व्रत रखती हैं।

सावन सोमवार पर पढ़ी जाने वाली कथाएँ

सावन के सोमवार को पारम्परिक रूप से सोमवार व्रत की कथा पढ़ी या सुनी जाती है। साहूकार और उसके अल्पायु पुत्र की कथा शिव सोमवार व्रत कथा में है। जो सावन के पहले सोमवार से सोलह सोमवार का संकल्प लेते हैं, वे सोलह सोमवार व्रत कथा पढ़ते हैं।

व्रत के नियम

  • व्रत स्त्री-पुरुष दोनों रख सकते हैं।
  • परम्परा में व्रत सूर्योदय से सूर्यास्त तक रहता है। पूरा उपवास सम्भव न हो तो सायंकाल शिव-पूजन के बाद एक बार भोजन किया जाता है; इसी कारण इसे एकभुक्त या नक्त व्रत भी कहते हैं।
  • पूजा पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके की जाती है। शिव के साथ पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नन्दी का भी पूजन होता है।
  • पूजा-सामग्री अर्पित करते हुए शिव का पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” और गणेश-पूजन में “ॐ गं गणपतये नमः” का जप किया जाता है।
  • शिव को बेलपत्र और सफेद पुष्प, गणेश को दूर्वा और मोदक अर्पित करने की प्रथा है। अन्त में शिव और गणेश की आरती की जाती है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — सावन के सोमवार व्रत — पूजन विधि एवं व्रत कथा, पृष्ठ 195–197

    पूजन विधि और पूजा-सामग्री पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्र (पृष्ठ 195) से उतारी गई और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गई। पुस्तक के पृष्ठ 196–197 पर किसी वेब-लेख का पुनर्मुद्रित अंश था; अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में उसे हटाया गया। तिथि, सावन मास का महत्व और व्रत के नियम के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए हैं।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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