सोमवार प्रदोष व्रत कथा
तिथि: सोमवार को पड़ने वाली त्रयोदशी (शुक्ल या कृष्ण पक्ष), जिसे सोम प्रदोष भी कहते हैं। व्रत उस दिन होता है जिस दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का संध्या-समय) में त्रयोदशी हो, और वह दिन जिस वार को पड़े उसी वार का प्रदोष माना जाता है। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है। इसी दिन की एक अन्य कथा सौम्य प्रदोष व्रत कथा में है।
सूतजी बोले कि हे ऋषियो! मान्यता है कि अभीष्ट की सिद्धि की कामना से किए गए इस व्रत से भगवान शिव व माता पार्वती प्रसन्न होकर व्रतकर्ताओं की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
व्रत विधि
व्रतकर्ताओं को चाहिए कि प्रातः स्नानोपरांत भगवान शिव व माता पार्वती का ध्यान करें और पूजन करके अर्घ्य प्रदान करें। फिर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र की एक माला रुद्राक्ष पर जाप करके इस प्रकार स्तुति करें — हे प्रभो! मैं ऋणभार व ग्रह दशा से पीड़ित हूँ। आप इन विपदाओं से मेरी रक्षा करें।
शौनक मुनि बोले कि हे मुने! आपने कामना पूर्ति करनेवाले इस व्रत के बारे में बताया। अब आप यह बताएँ कि यह व्रत किसने किया और इसको करने से क्या फल प्राप्ति होती है? इस पर सूतजी बोले कि हे ऋषियो! अब आप लोग यह कथा श्रवण करें—
कथा
कथा-स्रोत: पौराणिक कथा का लोक-प्रचलित रूप — मूल प्रसंग स्कन्द पुराण, ब्रह्मोत्तर खण्ड (प्रदोष-माहात्म्य) की धर्मगुप्त कथा है, जिसका विस्तृत रूप प्रदोष व्रत कथा पृष्ठ पर है; राजकुमार के घायल मिलने और शुचिव्रत के प्रधानमंत्री बनने के प्रसंग पुस्तिका के हैं।
किसी नगर में एक विधवा ब्राह्मणी रहती थी। उसको किसी का भी सहारा नहीं था। इसलिए वह अपने पुत्र शुचिव्रत को साथ लेकर सवेरे-सवेरे ही भिक्षा के लिए निकल पड़ती थी और भिक्षा में जो कुछ भी मिलता था उसी से दोनों माँ-बेटे अपना पेट भरते थे।
एक दिन जब वह ब्राह्मणी भिक्षा प्राप्त करके घर लौट रही थी तब मार्ग में उसे एक लड़का घायल अवस्था में पीड़ा से तिलमिलाता मिला। उसे तिलमिलाते देख ब्राह्मणी को उस पर दया आ गई और वह उसे अपने घर ले आई। वह लड़का सामान्य परिवार से नहीं था, बल्कि विदर्भ देश का राजकुमार था। पड़ोसी देश के राजा ने उसके पिता के राज्य पर आक्रमण करके पिता को बंदी बना लिया था और उसके राज्य पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। यही कारण था कि वह इस अवस्था को पहुँच गया था।
इस प्रकार वह राजकुमार शुचिव्रत के साथ ब्राह्मणी के घर में ही रहने लगा। एक दिन की बात है कि राजकुमार व शुचिव्रत दोनों जंगल में गए। वहाँ उन्हें एक गंधर्व कन्या मिली। वह राजकुमार पर मोहित हो गई। कुछ देर बाद शुचिव्रत तो घर लौट आया, लेकिन राजकुमार वहीं ठहर गया और उससे प्रेम-वार्ता करने लगा। गंधर्व कन्या का नाम अंशुमती था और वह विद्रविक नामक गंधर्व की पुत्री थी।
अगले दिन वह गंधर्व कन्या अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने के लिए उस जंगल में लेकर आई। उन्हें राजकुमार पसंद आ गया। कुछ दिनों बाद अंशुमती के माता-पिता को भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर आदेश दिया कि तुम अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह उस राजकुमार से कर दो। भगवान शिव के आदेशानुसार अंशुमती के माता-पिता ने अंशुमती का विवाह उस राजकुमार के साथ कर दिया।
उधर ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती रही। कथा के अनुसार, उसके व्रत के प्रभाव तथा गंधर्वराज की सेना की मदद से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और अपने पिता का राज्य पुनः प्राप्त करके आनंदपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मणी के पुत्र को अपने राज्य के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त कर दिया।
आरती
पूजन के अंत में श्री शिव आरती — ॐ जय शिव ओंकारा का गायन करें।
व्रत की सम्पूर्ण विधि, माहात्म्य एवं उद्यापन विधि के लिए देखें — प्रदोष व्रत कथा एवं पूजन विधि।
स्रोत 1
- प्रदोष व्रत कथा — पवन पॉकेट बुक्स, दिल्ली (मुद्रित पुस्तिका) — प्रदोष व्रत कथा (पूजन विधि, सातों वारों की प्रदोष कथाएँ, माहात्म्य, उद्यापन विधि व आरती सहित), पवन पॉकेट बुक्स, 4537 नई सड़क, दिल्ली-110006; पृष्ठ 2–23
पाठ मुद्रित पुस्तिका के पृष्ठ-चित्रों से मिलाकर उतारा गया है — दिया गया लिंक प्रकाशक का सूची-पृष्ठ है, पाठ का स्रोत नहीं। अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में फल-सम्बन्धी कथन मान्यता के रूप में रखे गए; तिथि और कथा-स्रोत की पंक्तियाँ वेद पथ द्वारा लिखी गई हैं।
यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।