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सोमवती अमावस्या व्रत कथा

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जिस महीने की अमावस्या सोमवार को पड़ती है उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। यह तिथि स्नान, दान, पितृ-तर्पण एवं पीपल पूजन के लिये विशेष मानी जाती है। नीचे इसका महत्व, पूजा-विधि, व्रत के नियम और पारम्परिक व्रत कथा दी गई है।

तिथि: सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या, किसी भी मास की। सोमवती वही अमावस्या मानी जाती है जो सोमवार के सूर्योदय के समय हो, इसलिए एक ही अमावस्या भारत में सोमवती हो सकती है और विदेश (जैसे अमेरिका) में नहीं। अमावस्या का मास-नाम पूर्णिमांत पंचांग में अमांत पंचांग से एक मास आगे होता है (जैसे पूर्णिमांत कार्तिक अमावस्या = अमांत आश्विन अमावस्या)। दिनांक स्थान के अनुसार बदल सकता है।

सोमवती अमावस्या का महत्व

अमावस्या पितरों की तिथि है, और सोमवार के संयोग से यह स्नान, दान और पितृ-तर्पण के लिए विशेष मानी जाती है। इस दिन मौन रहकर स्नान-ध्यान करने की परम्परा है। हरिद्वार, प्रयाग और कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर जैसे तीर्थों और पवित्र नदियों में इस दिन स्नान का विशेष पुण्य माना जाता है।

यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन स्त्रियाँ सौभाग्य की कामना से करती हैं। इस दिन पीपल के वृक्ष और भगवान विष्णु का पूजन तथा पीपल की 108 परिक्रमा का नियम है। मान्यता है कि श्रद्धा से ये कार्य करने पर मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

पूजा-विधि

  • प्रातः स्नान करें; सम्भव हो तो मौन रहें। पितरों के लिए जल और तिल से तर्पण करें।
  • पीपल के वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएँ, रोली, अक्षत, पुष्प और धूप-दीप से पीपल तथा भगवान विष्णु का पूजन करें।
  • कच्चा सूत (कलावा) लपेटते हुए पीपल की परिक्रमा करें; परम्परा में 108 परिक्रमाएँ की जाती हैं। कई स्त्रियाँ हर परिक्रमा पर कोई वस्तु (फल, मिठाई आदि) चढ़ाती हैं, जो बाद में दान कर दी जाती है।
  • इसके बाद यह कथा सुनें और सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा दें।

व्रत के नियम

  • व्रत सूर्योदय से पूजा और परिक्रमा पूरी होने तक रखा जाता है। कथा की नायिका की तरह कई स्त्रियाँ परिक्रमा पूरी होने तक निर्जल रहती हैं; अन्य परिवारों में फलाहार की रीति है।
  • परिक्रमा और कथा के बाद जल और भोजन ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।

सोमवती अमावस्या का व्रत करने वाली स्त्रियों को व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए। व्रत की कथा इस प्रकार है।

सोमवती अमावस्या व्रत कथा

कथा-स्रोत: लोक-परम्परा (उत्तर भारत की लोक-कथा)

एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। उसने सभी लड़कों का विवाह कर दिया था, परन्तु लड़की का अभी विवाह नहीं हुआ था। साहूकार के घर एक साधु प्रतिदिन भिक्षा माँगने आता था और बदले में आशीर्वाद देकर जाता था। वह साधु जो आशीर्वाद बहुओं को देता था और जो आशीर्वाद वह साहूकार की बेटी को देता था, उन दोनों में अंतर होता था। बहुओं को वह सुहाग का आशीर्वाद देता था, और बेटी को वह केवल भाइयों के सुख का आशीर्वाद देता था, सुहाग का नहीं।

एक दिन बेटी ने यह बात अपनी माता से कही, माँ भी इस बात को जानकर दुखी हुई। दूसरे दिन उसकी माता ने साधु से पूछा कि वे उसकी बेटी को ऐसा आशीर्वाद क्यों देते हैं। साधु ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया और वे चले गये। यह देखकर माता की चिन्ता और बढ़ गई।

माता ने तुरन्त पण्डित जी को बुलाया और उन्हें अपनी बेटी की जन्मपत्रिका देखने के लिये कहा। पण्डित जी ने जन्म पत्रिका देखकर कहा कि उनकी बेटी के भाग्य में विधवा होना लिखा है। यह बात सुनकर माता को और भी दुख हुआ। पण्डित जी से उपाय जानने के बाद यह निश्चित हुआ कि सात समुद्र पार एक धोबिन के पास जाकर उसकी माँग का सिन्दूर माँगकर अपनी माँग में लगाने से और सोमवती अमावस्या के व्रत करने से यह अशुभ योग भंग हो जायेगा।

यह सुनकर माता ने अपने पुत्रों से उसकी बेटी के साथ जाने का आग्रह किया, छोटे पुत्र के अलावा अन्य सभी पुत्रों ने साथ जाने के लिये मना कर दिया। दोनों भाई-बहन धोबिन से सिन्दूर लेने के लिये चल दिये। चलते-चलते दोनों समुद्र किनारे आ गये और समुद्र कैसे पार किया जाये, इसका विचार करने लगे। विचार करने के लिये दोनों जिस पेड़ के नीचे बैठे थे, उस पेड़ पर एक गिद्ध और गिद्धनी रहती थी।

जब भी गिद्धनी के बच्चे होते थे, एक साँप आकर उनके बच्चों को खा जाता था। उस दिन भी ऐसा ही हुआ, गिद्ध-गिद्धनी दोनों बाहर गये हुए थे कि साँप आया और गिद्धनी के बच्चे चिल्लाने लगे। साहूकार की बेटी समझ गई, उसने साहस से साँप को मार दिया। सायंकाल में जब गिद्ध और गिद्धनी वापस आये, तो उन्हें अपने बच्चों को जीवित देखकर खुशी हुई। दोनों ने लड़की को धोबिन के घर ले जाने में सहायता की। लड़की कई माह तक छुपकर धोबिन की सेवा करती रही। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर धोबिन ने अपनी माँग का सिन्दूर उसकी माँग में लगा दिया। इसके बाद वह निर्जल ही अपने घर की ओर चल दी। रास्ते में पीपल के पेड़ की परिक्रमा की, और उसके बाद जल ग्रहण किया। पीपल के पेड़ का पूजन करने और सोमवती अमावस्या का व्रत करने से उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई।

पुस्तिका में कथा इतनी ही है। कई क्षेत्रों में इसका लम्बा रूप भी कहा जाता है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — सोमवती अमावस्या व्रत कथा, पृष्ठ 237–238

    कथा पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों (पृष्ठ 237–238) से उतारी गई और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गई। पुस्तक में महत्व वाला अंश 2011 की एक समाचार-रिपोर्ट से लिया गया था; अक्टूबर 2026 की संपादकीय समीक्षा में उसे हटाकर महत्व, तिथि, पूजा-विधि और व्रत के नियम के खंड वेद पथ द्वारा लिखे गए, और कथा के अर्थ-दोष सुधारे गए।

यह सामग्री वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित है, और इसकी क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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